भारत की बड़ी अंतरिक्ष कामयाबी, अरबों साल पुरानी अलकनंदा आकाशगंगा!
जेम्स वेब टेलीस्कोप की मदद से मिली यह सर्पिल आकाशगंगा शुरुआती ब्रह्मांड की सबसे व्यवस्थित संरचनाओं में से एक

ब्रह्मांड जितना विशाल है, उतना ही रहस्यमय भी। हर दिन वैज्ञानिक अंतरिक्ष के बारे में कुछ नया खोजते हैं और हर खोज हमें हमारी ही कहानी के और करीब ले जाती है। इन्हीं रहस्यों के बीच भारतीय खगोलविदों ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने दुनिया भर के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। भारत के वैज्ञानिकों ने एक बेहद खास और अनोखी आकाशगंगा खोज निकाली है, जिसे देखकर विशेषज्ञ भी हैरान हैं, क्योंकि यह उस समय की है जब ब्रह्मांड की उम्र सिर्फ डेढ़ अरब साल थी।
इतिहास की सबसे बड़ी शुरुआत
आम तौर पर शुरुआती ब्रह्मांड को एक उथल-पुथल भरा दौर माना जाता है। उस समय की आकाशगंगाएं आकारहीन, अस्थिर और लगातार टकराव का हिस्सा होती थीं। पर इसी अव्यवस्थित काल में वैज्ञानिकों को जो आकाशगंगा दिखी, वह बिल्कुल अलग निकली। शांत, व्यवस्थित और खूबसूरत सर्पिल आकार में। यही बात इसे अब तक खोजी गई शुरुआती सर्पिल आकाशगंगाओं में सबसे अलग और खास बनाती है। यह खोज हमारे ब्रह्मांड की निर्माण प्रक्रिया को और बेहतर समझने का नया रास्ता खोलती है।

खोज का नाम – अलकनंदा आकाशगंगा
इस रोमांचक खोज का नेतृत्व पुणे स्थित राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र (NCRA) की शोधार्थी राशी जैन ने किया है। उन्होंने बताया कि यह आकाशगंगा अपनी संरचना में काफी हद तक हमारी मिल्की वे यानी “मंदाकिनी” जैसी दिखती है। इसी समानता की वजह से इसे प्रतीकात्मक रूप से “अलकनंदा आकाशगंगा” नाम दिया गया। जैसे भारत में अलकनंदा नदी मंदाकिनी की बहन नदी मानी जाती है, उसी तरह यह आकाशगंगा भी मिल्की वे की दूर आसमानी बहन समझी जा रही है।
कितनी दूर है यह रहस्यमयी दुनिया?
अलकनंदा आकाशगंगा पृथ्वी से लगभग 12 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। इसका मतलब यह हुआ कि हम आज जो रोशनी देख रहे हैं, वह उसी समय निकली थी, जब ब्रह्मांड की उम्र लगभग डेढ़ अरब साल थी। इसका आकार भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। यह लगभग 30 हजार प्रकाश वर्ष तक फैली हुई है और इसकी सर्पिल भुजाएं किसी घुमावदार नदी की तरह ब्रह्मांड में फैली दिखाई देती हैं। केंद्र में चमकता हुआ हिस्सा बताता है कि इसके भीतर तारे तेजी से बन रहे हैं।
वैज्ञानिक चकित क्यों हैं?
अब तक माना जाता था कि सर्पिल आकाशगंगा बनने में अरबों साल लगते हैं। इन्हें बनने के लिए समय, स्थिरता और ऊर्जा की जरूरत होती है, जबकि शुरुआती ब्रह्मांड में सब कुछ अव्यवस्थित था। हर जगह तारे फट रहे थे, गैसें घूम रही थीं और आकाशगंगाएं एक-दूसरे से टकरा रही थीं। ऐसे माहौल में इतनी व्यवस्थित और परिपक्व आकाशगंगा का मिलना वैज्ञानिकों के सिद्धांतों और समझ को चुनौती देता है। यह खोज बताती है कि ब्रह्मांड के विकास की प्रक्रिया शायद पहले की सोच से ज्यादा तेज और जटिल रही होगी।
यह खोज संभव कैसे हुई?
इस खोज का श्रेय आधुनिक तकनीक और शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीनों को जाता है। नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) ने इस आकाशगंगा की बेहद स्पष्ट तस्वीरें भेजीं। इस टेलीस्कोप ने हमें पहली बार यह दिखाया कि शुरुआती ब्रह्मांड कितना अलग और अद्भुत था। 2021 में लॉन्च हुआ JWST अपने इन्फ्रारेड कैमरों की मदद से उन रोशनियों को भी पकड़ लेता है, जो अरबों वर्षों की यात्रा में फीकी पड़ चुकी हैं। इसी वजह से वैज्ञानिकों को अलकनंदा जैसी आकाशगंगाएं देखने का मौका मिल रहा है।
आगे कौन से सवालों के जवाब खोजे जाएंगे?
- अब शोधकर्ता इससे जुड़े गहरे सवालों पर काम कर रहे हैं,
- इसकी गैसें कितनी गर्म या ठंडी हैं?
- इसके तारे किस गति से घूमते हैं?
- इसकी सर्पिल संरचना कैसे बनी?
क्या यह किसी अन्य आकाशगंगा से टकराव में आई थी या स्वत विकसित हुई?इन सभी सवालों के जवाब पाने के लिए JWST के अलावा अब चिली स्थित ALMA टेलीस्कोप से भी डेटा लिया जाएगा।
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