
सरकार ने दूसरे क्वार्टर की जीडीपी ग्रोथ 8.02% बताई है, जो छह क्वार्टर में सबसे तेज़ बढ़त है। लेकिन IMF द्वारा भारत के नेशनल अकाउंट्स डेटा को ‘C’ कैटेगरी में रखने से विवाद गहरा गया है और विपक्ष आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है।
सरकार ने 27 नवंबर को जीडीपी के आंकड़े जारी किए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दूसरे क्वार्टर में भारत की जीडीपी 8.02% की दर से बढ़ी है। जीडीपी की दर में ये बढ़ोतरी पिछले 6 क्वार्टर का सबसे बेहतर प्रदर्शन है । इस बढ़त की मुख्य वजह ग्रामीण मांग में बढ़ोतरी, त्योहारी सीजन में बड़ी खपत और जीएसटी कट का शुरुआती प्रभाव बताया जा रहा है। हालांकि जीएसटी कट की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था में जो उछाल आया है वह वित्तीय वर्ष 2025- 26 के तीसरे क्वार्टर के आंकड़ों में दिखाई देगा।
पिछले साल इसी क्वार्टर की जीडीपी दर 5.6% थी। वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले क्वार्टर अर्थात अप्रैल – जून की जीडीपी दर 7.8% थी। लेकिन आईएमएफ़ ने भारत के नेशनल अकाउंट्स के डेटा को ‘C’ केटेगरी में रखा है जिसपर अब विवाद शुरू हो गया है। इसमें जीडीपी मापने वाला भी डेटा भी शामिल होता है। विपक्ष मुखर होकर सरकार पर आंकड़ों से छेड़छाड़ के आरोप लगा रहा है। भारत का हमेशा पक्ष रहा है कि आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाए विकसित देशों पर ज्यादा मेहरबान होती है। वहीं विकासशील देशों को हमेशा शक की निगाह से देखती है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा आँकड़े उत्साहजनक
जीडीपी की बढ़ी हुई दर पर सरकार क्रेडिट लेती हुई दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जीडीपी में हुई यह वृद्धि हमारी सरकार की ग्रोथ फ्रेंडली नीतियों का नतीजा है। वहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि जीडीपी की यह बड़ी हुई रफ्तार देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती दिखा रही है। लेकिन इन आंकड़ों को लेकर आईएमएफ के दावे के बाद बवाल शुरू हो गया है । आईएमएफ ने भारत के नेशनल अकाउंट के डेटा को केटेगरी सी में रखा है अर्थात इस प्रकार का डाटा जिसमें डेटा का संकलन बहुत खराब तरीके से किया गया हो इसी को लेकर विपक्ष और तमाम लोग सरकार पर आंकड़ों से छेड़छाड़ के आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसमें निजी निवेश में कोई ग्रोथ नहीं दिख रही है यह आंकड़े निराशाजनक है और आईएमएफ की रिपोर्ट का जिक्र किया है।
वैश्विक अस्थिरता के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था का बेहतर प्रदर्शन
पिछले कुछ समय में पूरे विश्व में अस्थिरता का दौर रहा है। इजरायल-फिलिस्तीन के बीच तनाव से लेकर यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध ने पूरे विश्व के व्यापार को बुरी तरीके से प्रभावित किया है इसके साथ ही अमेरिकी टैरिफ ने भी वैश्विक व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में टैरिफ का प्रभाव पड़ा है। आयात निर्यात पर बुरे प्रभाव से घरेलू निवेश,रोजगार पर लगातार संकट के बादल छाए रहे। इसी वजह से प्राइवेट इन्वेस्टमेंट की रफ्तार काफी मंद पड़ी है।
IMF ने भारत को क्यों दिया सी ग्रेड
भारत की जीडीपी का लगभग 45% हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है जो लगभग 80% रोजगार सृजन करता है। इसमें रेहड़ी पटरी से लेकर छोटे दुकानदार बड़ी संख्या में होते है । यहाँ से आंकड़े इकट्ठा करना और व्यवस्थित करना एक जटिल प्रक्रिया है जिस वजह से आईएमएफ इस डेटा को बहुत विश्वसनीय नहीं मानता है । इसके अलावा भारत में आंकड़े इकट्ठे करने के लिए जो सैंपलिंग की प्रक्रिया है उसको लेकर भी आईएमएफ सवाल उठाता रहा है इसी वजह से इसकी एक्यूरेसी सवालों के घेरे में आती रही है।
अमेरिका,ब्रिटेन है A केटेगरी में
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार उच्च गुणवत्ता वाला पारदर्शी डाटा प्रकाशित करने वाले देशों की सूची में अमेरिका ब्रिटेन जापान और कनाडा शामिल है। वहीं जिन देशों का डाटा मॉडरेट रूप से ठीक है उनमें चीन, ब्राजील और दक्षिण कोरिया शामिल है। जिन देशों का डेटा खराब है उन देशों में भारत,इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देश है इसके अलावा जिन देशों में युद्ध, अस्थिरता या किन्हीं अन्य वजह से डाटा कलेक्शन ठीक नहीं मिलता है उन्हें ग्रुप डी में रखा गया है।
सैंपलिंग,सर्वे और डेटा कलेक्शन में है भारी अनियमितता
भारत में समयबद्ध सर्वे और डेटा संकलन को लेकर भी बहुत सी अनियमितताएं देखी गई है। जैसे जनगणना और रोजगार को लेकर भी भारत के आंकड़ों में स्पष्टता की कमी दिखाई देती है। आईएमएफ की चिंता विशेषकर असंगठित क्षेत्र में सैंपलिंग और डेटा इकट्ठा करने के तरीकों को लेकर है। साथ ही जीएसटी का संकलन जिस विधि से किया जाता है उसको लेकर भी स्पष्टता नहीं है। ट्रांसपरेंसी के अभाव में इस पर अंतरराष्ट्रीय नजर रखना मुश्किल हो जाता है इसीलिए आईएमएफ ने पाकिस्तान के साथ भारत को भी ग्रेड सी में रखा हुआ है।
जीडीपी नापने की विधियों पर भी सवाल
भारत की जीडीपी नापने की अलग-अलग विधियों को लेकर भी आईएमएफ सवाल उठाते रही है क्योंकि इसके डेटा में असमानताएं लगातार सवालों का केंद्र बनती रही है। सर्वे पुरानी सैंपलिंग पर आधारित है जो नए प्रशासनिक डाटा सेट जिसमें डिजिटल पेमेंट जीएसटी और यूपीआई ट्रांजैक्शन भी शामिल है इसके साथ व्यवस्थित तरीके से इंटीग्रेटेड नहीं किया गया है।
इसकी मुख्य वजह जीडीपी नापने का बेस ईयर है भारत में जीडीपी का कैलकुलेशन 2011-12 के आंकड़ों पर किया जाता है अगला रिवीजन अभी भी पेंडिंग है जिसका आधार वर्ष 2022-23 किए जाने की उम्मीद है । अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप एकरूपता नहीं आने पर आईएमएफ किसी देश को खराब श्रेणी में डाल देता है क्योंकि इसकी वजह से वैश्विक स्तर पर डाटा में असमानता की स्थिति पैदा होती है साथ ही गरीबी सतत विकास लक्ष्य जलवायु परिवर्तन जैसे आंकड़े भी स्पष्टता के साथ प्रकाशित करना मुश्किल हो जाता है ।
सरकार कर रही सुधार
हालांकि भारत सरकार भी इसे ठीक करने के लिए अपने इंडिकेटर पर काम कर रही है जिसमें भारत सरकार जीडीपी का आधार वर्ष रिवाइज करने की तैयारी में है जिसे 2011-12 से अब 2022-23 किया जाएगा। इस रिवीजन के अंतर्गत जीएसटी डेटा को सम्मिलित किया जाएगा यूपीआई और डिजिटल पेमेंट का भी डाटा इसमें शामिल किया जाएगा। सांख्यिकी विभाग कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे को और बेहतर बनाने की प्रक्रिया में है साथ ही पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे को भी इसमें जोड़ा जाएगा इसके अलावा डेटा संकलन के नोट्स भी समय-समय पर प्रकाशित करने की तैयारी है।
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