नहीं रहें पियूष पांडे जिन्होंने किया था, अबकी बार मोदी सरकार जैसे कई कैंपेन

मुंबई। भारत के दिग्गज विज्ञापन गुरु पीयूष पांडे का 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन से पूरे विज्ञापन जगत में शोक की लहर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण समेत कई दिग्गजों ने श्रद्धांजलि दी।
विज्ञापन की दुनिया के ‘जादूगर’
चार दशकों तक भारतीय विज्ञापन जगत में अमिट छाप छोड़ने वाले पीयूष पांडे ने देश को ‘दो बूंद जिंदगी की’ और ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ जैसे यादगार ऐड दिए। उन्होंने आम लोगों की भाषा में संदेश देने की कला को नया आयाम दिया। वे ओगिल्वी इंडिया के कार्यकारी अध्यक्ष और विश्वव्यापी मुख्य रचनात्मक अधिकारी रहे। उनके नेतृत्व में कंपनी 12 साल तक भारत की नंबर-1 एजेंसी बनी रही।
शुरुआत से सफलता तक
पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर (राजस्थान) में हुआ था। उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से इतिहास में पोस्टग्रेजुएशन किया। शुरुआती दौर में उन्होंने कई नौकरियाँ कीं, लेकिन 1982 में विज्ञापन की दुनिया में कदम रखते ही इतिहास रच दिया। उनका पहला लोकप्रिय ऐड था — “चल मेरी लूना”, जिसने उन्हें पहचान दिलाई। 1988 में उन्होंने ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ गीत के शब्द लिखे, जो आज भी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना जाता है।
40 साल की रचनात्मक यात्रा
पीयूष पांडे ने फेविकोल, कैडबरी, एशियन पेंट्स, बजाज, कोका-कोला, फॉर्च्यून ऑयल जैसे कई बड़े ब्रांड्स के लिए ऐड बनाए।
उनके मशहूर अभियानों में शामिल हैं —
- “दो बूंद जिंदगी की” (पोलियो अभियान)
- “हमारा बजाज”
- “ठंडा मतलब कोका-कोला”
- “हर घर कुछ कहता है” (एशियन पेंट्स)
- “अबकी बार मोदी सरकार”
उनके विज्ञापन सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं से जुड़ने की कोशिश थे।
जिंगल्स और फिल्मों से भी जुड़ाव
पीयूष पांडे ने विज्ञापनों में हिंदी जिंगल और स्थानीय भाषा का सुंदर प्रयोग किया, जिससे आम लोगों तक संदेश आसानी से पहुंचा।
उन्होंने ‘भोपाल एक्सप्रेस’ फिल्म की पटकथा लिखी और ‘मद्रास कैफे’ में अभिनय भी किया।
सम्मान और पहचान
- उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 2016 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
- उन्हें दुनिया के शीर्ष 100 रचनात्मक व्यक्तियों में कई बार शामिल किया गया।
शोक और श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा —“पीयूष पांडे जी अपनी रचनात्मकता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने विज्ञापन और संचार जगत में अभूतपूर्व योगदान दिया। उनके निधन से दुखी हूं।”
निर्मला सीतारमण ने लिखा —“उन्होंने आम बोलचाल की भाषा और हास्य को विज्ञापनों में लाकर भारतीय संचार शैली को हमेशा के लिए बदल दिया।”
रचनात्मकता का युग खत्म, लेकिन विरासत अमर
- पीयूष पांडे सिर्फ एक विज्ञापन विशेषज्ञ नहीं, बल्कि रचनात्मकता के प्रतीक थे।
- उनके शब्द, उनके विचार और उनके बनाए जिंगल आज भी करोड़ों भारतीयों की यादों में बसे हैं।
- उनके जाने से भारतीय विज्ञापन जगत में एक युग का अंत हो गया, लेकिन उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।
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