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Halloween का डरावना सच! जब लौटती हैं आत्माएं धरती पर — जानें इस रहस्यमयी त्योहार की कहानी

Halloween का डरावना सच! जब लौटती हैं आत्माएं धरती पर — जानें इस रहस्यमयी त्योहार की कहानी

 

नई दिल्ली: 31 अक्टूबर की रात को पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला Halloween आज एक मजेदार पार्टी का रूप ले चुका है। लोग डरावने कपड़े पहनते हैं, भूत-प्रेत जैसा मेकअप करते हैं और दोस्तों के साथ जश्न मनाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह त्योहार कभी आत्माओं के लौटने की रात माना जाता था? इसकी जड़ें करीब 2000 साल पुरानी एक सेल्टिक परंपरा में छिपी हैं, जिसे सैमहेन (Samhain) कहा जाता था।

 

क्या है ‘हैलोवीन’?

‘हैलोवीन’ शब्द वास्तव में ‘ऑल हैलोज ईव’ से बना है, जिसका मतलब है ‘सभी संतों की संध्या’।

यह दिन 1 नवंबर को मनाए जाने वाले ‘ऑल सेंट्स डे’ से ठीक पहले की रात होती है। पुराने समय में माना जाता था कि इस रात मृत आत्माएं धरती पर लौट आती हैं। लोग बुरी आत्माओं से बचने के लिए डरावना रूप धारण करते थे, ताकि आत्माएं उन्हें पहचान न सकें या उनसे डर जाएं।

 

सेल्टिक त्योहार ‘सैमहेन’ से हुई शुरुआत

हैलोवीन की जड़ें प्राचीन सेल्टिक त्योहार ‘सैमहेन’ (Samhain) से जुड़ी हैं, जिसे आज से करीब 2000 साल पहले आयरलैंड, ब्रिटेन और उत्तरी फ्रांस में मनाया जाता था।

सेल्टिक लोगों के लिए 1 नवंबर नया साल होता था — यह समय फसल कटाई खत्म होने और सर्दियों की शुरुआत का प्रतीक था। उनका विश्वास था कि 31 अक्टूबर की रात को जीवित और मृत लोगों की दुनिया के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है, और इसी दौरान मृत आत्माएं धरती पर लौटती हैं।

बुरी आत्माओं से बचने के लिए लोग अलाव जलाते, जानवरों की बलि देते, और पशु-खाल पहनकर खुद को छिपाने की कोशिश करते थे। यही परंपरा आगे चलकर हैलोवीन के कॉस्ट्यूम और ट्रिक-ऑर-ट्रीट जैसी आधुनिक रस्मों में बदल गई।

ईसाई परंपराओं से जुड़ा ‘ऑल सेंट्स डे’

आठवीं शताब्दी में पोप ग्रेगरी तृतीय ने 1 नवंबर को ‘ऑल सेंट्स डे’ घोषित किया — एक ऐसा दिन जब सभी संतों और शहीदों को याद किया जाता था।

इससे एक रात पहले की शाम को ‘ऑल हैलोज ईव’ कहा गया, जो समय के साथ ‘हैलोवीन’ बन गया। धीरे-धीरे ईसाई परंपराओं ने सैमहेन की मान्यताओं को भी अपनाया, और दोनों मिलकर आज के हैलोवीन उत्सव का रूप बन गए।

 

कद्दू और ‘ट्रिक-ऑर-ट्रीट’ की कहानी

19वीं शताब्दी में जब आयरलैंड के लोग अमेरिका में बसने गए, तो वे अपने साथ हैलोवीन की परंपराएं भी ले गए। वहीं इस त्योहार ने मनोरंजन और सामुदायिक उत्सव का रूप ले लिया। बच्चों के बीच ‘ट्रिक-ऑर-ट्रीट’ की परंपरा शुरू हुई, जिसमें वे पड़ोसियों के घर जाकर कैंडी और ट्रीट मांगते हैं।

कद्दू की सजावट की परंपरा भी अमेरिका में ही लोकप्रिय हुई। पहले आयरलैंड में लोग शलजम (Turnip) खोखला करके उसमें चेहरा बनाते थे, लेकिन अमेरिका में कद्दू (Pumpkin) आसानी से मिलने लगा। वहां से ‘जैक-ओ-लैंटर्न’ बनाने की प्रथा शुरू हुई — लोग कद्दू को काटकर डरावना चेहरा बनाते हैं और उसमें मोमबत्ती जलाकर घर के बाहर रखते हैं।

भारत में भी बढ़ रहा है हैलोवीन का क्रेज

अब भारत में भी हैलोवीन का चलन तेजी से बढ़ रहा है।सोशल मीडिया, वैश्विक संस्कृति और हॉलीवुड फिल्मों के प्रभाव से यह त्योहार युवाओं के बीच लोकप्रिय हो चुका है।आज हैलोवीन सिर्फ आत्माओं और रहस्यों की रात नहीं, बल्कि कला, फैशन और क्रिएटिविटी का उत्सव बन चुका है।मॉल, रेस्टोरेंट्स और ब्रांड्स भी अब हैलोवीन थीम पर सजावट करते हैं और विशेष ऑफर लॉन्च करते हैं।

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Shashwat Srijan

Content Writer

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