वोटों की जंग में पूरी ताकत झोंक एनडीए और महागठबंधन दोनों ने बढ़ाई इस समुदाय पर नजर टिकट बंटवारे से लेकर बयानबाज़ी तक, हर दल लगा है कुशवाहा वोट बैंक साधने में ।
बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल अब गरमाने लगा है। जैसे-जैसे तारीख़ नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे जातीय समीकरण भी पूरी ताकत के साथ उभरने लगे हैं। इस बार सियासत के केंद्र में है। मौर्य-कुशवाहा समुदाय, जिसे बिहार के सबसे प्रभावशाली ओबीसी समूहों में गिना जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस समुदाय का रुख़ जिस ओर झुकता है, अक्सर सत्ता की डगर भी उसी दिशा में मुड़ जाती है। शायद यही वजह है कि एनडीए और महागठबंधन, दोनों ही खेमे इस बार कुशवाहा वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए हर संभव कोशिश में जुटे हैं।
कुशवाहा समुदाय का राजनीतिक प्रभाव
बिहार की राजनीति में कुशवाहा समाज की गहरी पैठ है। राज्य के तकरीबन हर इलाके में इस समुदाय की मौजूदगी है, खासकर मध्य और दक्षिण बिहार में इनकी जनसंख्या निर्णायक है। अनुमान है कि कुशवाहा-मौर्य समुदाय राज्य की आबादी का 7 से 9 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। जो किसी भी चुनावी मुकाबले में बड़ा फर्क पैदा कर सकता है।
यही कारण है कि दोनों गठबंधन इस समुदाय को साधने के लिए टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार रणनीति तक में विशेष ध्यान दे रहे हैं।
दोनों गठबंधनों में बराबर की टक्कर
इस बार के टिकट वितरण पर नज़र डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि कुशवाहा समाज को लुभाने की होड़ किस स्तर तक है।
- एनडीए ने इस समुदाय से आने वाले 22 उम्मीदवारों को टिकट दिया है।
- महागठबंधन ने भी 22 कुशवाहा उम्मीदवारों को मौका देकर बराबरी कर ली है।
यानी दोनों खेमे यह संदेश देना चाहते हैं कि वे कुशवाहा समाज की राजनीतिक ताकत को भली-भांति समझते हैं और उसे सम्मान देने के लिए तैयार हैं।

एनडीए का दांव – सम्राट चौधरी के सहारे कुशवाहा वोटों पर फोकस
एनडीए में इस समुदाय का सबसे बड़ा चेहरा हैं — डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी। खुद कुशवाहा जाति से आने वाले सम्राट चौधरी न सिर्फ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं, बल्कि भाजपा का पिछड़ा वर्ग पर भरोसा बनाए रखने का मुख्य स्तंभ भी बन चुके हैं। बीजेपी, सम्राट चौधरी को ओबीसी नेतृत्व का चेहरा बनाकर न सिर्फ यादव वोटों के प्रभाव को चुनौती देना चाहती है, बल्कि कुशवाहा-मौर्य समुदाय को भी पूरी तरह साथ लाना चाहती है।
एनडीए के सहयोगी जदयू ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए 13 टिकट कुशवाहा उम्मीदवारों को दिए हैं। वहीं भाजपा ने 5 सीटें, रालोमो (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) ने 3 और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने 1 टिकट देकर समुदाय को सम्मान देने की रणनीति अपनाई है।
महागठबंधन का जवाब
दूसरी ओर, महागठबंधन भी पीछे नहीं है। राजद और कांग्रेस, दोनों ही दल कुशवाहा समुदाय को साधने के लिए अलग-अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं। राजद ने 13 टिकट कुशवाहा नेताओं को दिए हैं, जबकि माले और कांग्रेस ने 5-5 टिकट, और सीपीएम ने 2 टिकट देकर जातीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। महागठबंधन का मुख्य लक्ष्य है — इस समुदाय को याद दिलाना कि सामाजिक न्याय की राजनीति का आधार वही रहा है।
उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका और चुनौती
उपेंद्र कुशवाहा, जो राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख हैं, लंबे समय से इस समुदाय के प्रतीक माने जाते रहे हैं। एक समय वे राज्य की राजनीति में निर्णायक चेहरा हुआ करते थे, लेकिन बीते कुछ वर्षों में उनका प्रभाव सीमित हुआ है। हालांकि, अब भी उनकी लोकप्रियता कुशवाहा और कोइरी समाज के बीच काफ़ी है। यही वजह है कि दोनों गठबंधन चाहते हैं कि किसी तरह उपेंद्र कुशवाहा के समर्थक वोटों का झुकाव उनके पक्ष में हो।
राजनीतिक दलों के अनुसार, अगर उपेंद्र कुशवाहा का वोट बैंक बंट जाता है, तो इसका सीधा असर कई हाशिये की सीटों पर पड़ेगा। वहीं अगर किसी एक गठबंधन को ये वोट पूरी तरह मिल जाएं, तो नतीजे पलट सकते हैं।
जातीय राजनीति में कुशवाहा समाज का महत्व
बिहार में राजनीति और जाति का रिश्ता पुराना है। यादव, कुशवाहा, पासवान, मुसहर, भूमिहार और ब्राह्मण हर जातीय समूह अपने-अपने हिस्से की राजनीतिक हिस्सेदारी मांगता है। कुशवाहा समाज की खासियत यह है कि यह न तो पूरी तरह किसी एक पार्टी से जुड़ा है, न ही पूरी तरह विरोध में। यही वजह है कि हर चुनाव में यह समाज “किंगमेकर” बन जाता है।
राजनीति के जानकार कहते हैं कि यह समुदाय 2-5% वोट शेयर पर असर डाल सकता है, और बिहार जैसे राज्य में, जहाँ मुकाबले त्रिकोणीय या बहुकोणीय होते हैं, यह वोट प्रतिशत सरकार बनाने या गिराने में निर्णायक हो सकता है।
क्या सम्राट चौधरी बनेंगे सर्वमान्य नेता?
भले ही कई कुशवाहा नेता बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं। जैसे सम्राट चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा, आलोक मेहता मगर अब तक इस समुदाय का कोई एक सर्वमान्य नेता नहीं उभर पाया है। सम्राट चौधरी ने बीजेपी के भीतर अपना कद जरूर बढ़ाया है, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा का एक वर्ग अब भी उन्हें पारंपरिक नेता के रूप में देखता है। यही कारण है कि इस चुनाव में कुशवाहा समाज की भूमिका पहले से कहीं अधिक अहम हो गई है। बिहार चुनाव में इस बार नारा कोई भी दे,“विकास”, “समानता” या “सुशासन” लेकिन असली मुकाबला जातीय जोड़-घटाव में ही सिमटता दिख रहा है।
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