बिहार विधानसभा चुनाव से पहले JDU का बड़ा दांव — अमौर सीट से सबा जफर की जगह साबिर अली को टिकट, सियासी समीकरणों में नया मोड़।

साबिर आली की वापसी : बिहार विधानसभा चुनाव के बीच जनता दल (यूनाइटेड) यानी जद(यू) ने एक अप्रत्याशित कदम उठाकर सबको चौंका दिया है। पार्टी ने अमौर विधानसभा सीट से अपने उम्मीदवार में अचानक बदलाव करते हुए राज्यसभा के पूर्व सदस्य साबिर अली को टिकट दे दिया है। इससे पहले इसी सीट से सबा जफर को उम्मीदवार घोषित किया गया था, जो 2020 के चुनाव में दूसरे स्थान पर रही थीं। लेकिन आखिरी वक्त में उन्हें हटाकर पार्टी ने साबिर अली पर भरोसा जताया।
साबिर अली की वापसी से सियासी हलचल
पूर्णिया जिले में आयोजित एक कार्यक्रम में साबिर अली ने शनिवार को औपचारिक रूप से जद(यू) में दोबारा शामिल होकर राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। इस मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की करीबी और राज्य सरकार की मंत्री लेशी सिंह भी मौजूद थीं, जो धमदहा सीट से लगातार चौथी बार चुनाव मैदान में हैं।
साबिर अली की राजनीतिक यात्रा काफी दिलचस्प रही है — उतार-चढ़ाव से भरी, कभी सत्ता के करीब तो कभी विवादों के घेरे में। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) से की थी। इसी पार्टी के टिकट पर वे राज्यसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने जद(यू) का दामन थामा और लगातार दूसरा कार्यकाल भी हासिल किया। लेकिन 2014 में एक बयान ने उनकी राजनीति की दिशा ही बदल दी।

मोदी की प्रशंसा पर निष्कासन
2014 में साबिर अली ने सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी। उस वक्त नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच गठबंधन टूट चुका था। इस वजह से नीतीश ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। तब इस फैसले को नीतीश के सिद्धांतों पर टिके रहने की मिसाल बताया गया था, लेकिन अब वही साबिर अली फिर उसी पार्टी में वापस हैं।
बीजेपी में आए, फिर विवाद में फंसे
जद(यू) से निकाले जाने के बाद साबिर अली ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में प्रवेश किया। लेकिन वहां भी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। कुछ वरिष्ठ बीजेपी नेताओं ने उन पर आतंकी यासीन भटकल से संबंध होने का आरोप लगाया, जिसके चलते पार्टी ने उन्हें बाहर कर दिया। बाद में जांच और समय के साथ मामला ठंडा पड़ा और 2015 में वे दोबारा बीजेपी में लौटे।
उनकी वापसी के बाद 2021 में उन्हें बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। इस पद पर उन्होंने संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन बिहार की राजनीति में उनकी वापसी लंबे समय तक नहीं हो पाई।
अब JDU के टिकट पर अमौर से दांव
अब करीब 11 साल बाद, साबिर अली दोबारा नीतीश कुमार के साथ खड़े हैं। जद(यू) ने उन्हें अमौर विधानसभा सीट से उम्मीदवार घोषित किया है। यह सीट पूर्णिया जिले की एक अहम मुस्लिम बहुल सीट मानी जाती है। यहां साबिर अली का मुकाबला एआईएमआईएम (AIMIM) के मौजूदा विधायक अख्तरुल इमान से होगा, जो इस वक्त बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के एकमात्र विधायक हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जद(यू) का यह फैसला सिर्फ टिकट बदलने का मामला नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चाल है। नीतीश कुमार ने इस कदम से कई संदेश देने की कोशिश की है — एक तरफ वे अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं, तो दूसरी ओर पुराने सहयोगियों को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि पार्टी में लौटने का रास्ता हमेशा खुला है।

रणनीति के पीछे क्या है
नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा से संतुलन और समीकरणों के प्रबंधन के लिए जानी जाती है। उन्होंने कई बार अपने विरोधियों को भी मित्र बना लिया और कभी-कभी अपने सहयोगियों को दूर कर दिया। इस बार साबिर अली की वापसी को भी उसी राजनीतिक समझ का हिस्सा माना जा रहा है।
अमौर पर मुस्लिम वोटों की सख्त जरूरत है, क्योंकि 2020 के चुनाव में वहां एआईएमआईएम ने बढ़िया प्रदर्शन किया था। ऐसे में साबिर अली जैसे चेहरे को आगे लाना नीतीश की अल्पसंख्यक कार्ड की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
सबा जफर की नाराजगी और पार्टी का मौन
हालांकि, पार्टी की ओर से यह नहीं बताया गया कि सबा जफर को टिकट क्यों काटा गया। 2020 में उन्होंने मजबूत प्रदर्शन किया था और हार के बावजूद स्थानीय स्तर पर उनकी अच्छी पकड़ थी। अचानक टिकट कटने से उनके समर्थकों में नाराजगी भी देखी जा रही है, लेकिन जद(यू) ने इस पर कोई बयान जारी नहीं किया।
नीतीश का बड़ा राजनीतिक संदेश
साबिर अली की वापसी केवल एक नेता की वापसी नहीं है, बल्कि नीतीश कुमार की राजनीतिक लचीलापन का संकेत भी है। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की है कि जद(यू) में कोई “दरवाजा हमेशा के लिए बंद” नहीं होता। अगर कोई व्यक्ति पार्टी की विचारधारा और नीतीश के नेतृत्व को स्वीकार करता है, तो उसे फिर से जगह मिल सकती है।
इसके अलावा, इससे यह भी संदेश गया कि जद(यू) चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों पर फोकस कर रही है, खासकर उन इलाकों में जहां बीजेपी की पकड़ कमजोर है।
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