तमिलनाडु में हिन्दी बैन का बिल, CM स्टालिन ने उठाई आवाज़ !
CM स्टालिन ने पहले भी केंद्र सरकार की तीन-भाषा नीति,हिंदी थोपने की कोशिशें राज्य की संस्कृति और भाषा पर हमला
तमिलनाडु की सरकार जल्द ही राज्य में हिंदी भाषा के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाला एक नया बिल पेश कर सकती है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम DMK सरकार इस बिल को विधानसभा में बुधवार को पेश करने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के अनुसार, सरकार तमिलनाडु में हिंदी के होर्डिंग्स, बोर्ड, फिल्मों और गानों पर प्रतिबंध लगाने की योजना बना रही है।
सरकार ने मंगलवार रात अचानक एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई, जिसमें कानूनी विशेषज्ञों को शामिल किया गया। इस बैठक में बिल की बारीकियों और कानूनी पक्षों पर चर्चा हुई। इस बिल को पेश करने का उद्देश्य हिंदी थोपने के विरोध में स्पष्ट कदम उठाना है।
आख़िर क्या हैं असली वजह ?
तमिलनाडु और केंद्र सरकार के बीच लंबे समय से हिंदी भाषा के इस्तेमाल को लेकर विवाद चल रहा है। इस साल मार्च में ही CM स्टालिन ने स्टेट बजट 2025-26 के सिंबल से ‘₹’ को हटा कर तमिल अक्षर ‘ரூ’ लगा दिया। यह कदम राज्य की स्थानीय भाषा को प्राथमिकता देने और हिंदी थोपने के विरोध का प्रतीक माना गया।
CM स्टालिन ने पहले भी केंद्र सरकार की तीन-भाषा नीति का विरोध किया है। उनका कहना है कि हिंदी थोपने की कोशिशें राज्य की संस्कृति और भाषा पर हमला हैं। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि यह नीति गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी जबरदस्ती थोपती है। उनका मानना है कि राज्य की दो-भाषा नीति तमिल और अंग्रेजी शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के लिहाज से ज्यादा उपयोगी रही है।
स्टालिन की चेतावनी और हिंदी का विरोध
CM स्टालिन ने बार-बार कहा है कि हिंदी जबरन थोपने से कई भारतीय भाषाएँ खतरे में हैं। उन्होंने 27 फरवरी को कहा कि पिछले 100 सालों में हिंदी ने उत्तर भारत की 25 भाषाओं को लगभग खत्म कर दिया है। उन्होंने X पर ट्वीट करते हुए लिखा कि भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही, मारवाड़ी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, हो, खरिया, खोरठा, कुरमाली, कुरुख, मुंडारी जैसी भाषाएं अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं।
उनका कहना है कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि यह स्थानीय भाषाओं और संस्कृति को दबाने का एक माध्यम बन गई है। हिंदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए राज्य सरकार ने अब बिल की तैयारी शुरू की है।
• क्या है तीन-भाषा नीति और इसके नियम
तीन-भाषा नीति 1968 में लागू हुई थी। इसके तहत छात्रों को स्कूलों में तीन भाषाएँ सिखाई जाती हैं, एक स्थानीय भाषा, एक राष्ट्रीय भाषा और एक अंतरराष्ट्रीय भाषा। 2020 में इसे संशोधित कर नई शिक्षा नीति (NEP 2020) लाई गई।
NEP 2020 के अनुसार –
1. प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 से 5) में पढ़ाई स्थानीय भाषा या मातृभाषा में होनी चाहिए।
2. मिडिल कक्षाओं (कक्षा 6 से 10) में तीन भाषाएँ पढ़ना अनिवार्य है।
3. गैर-हिंदी भाषी राज्यों में तीसरी भाषा अंग्रेजी या किसी अन्य भारतीय भाषा को चुना जा सकता है।
4. 11वीं और 12वीं में स्कूलों को विदेशी भाषा पढ़ाने का विकल्प भी दिया गया है।
इस नीति में छात्रों को किसी भी भाषा को अनिवार्य रूप से सीखने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। राज्य और स्कूलों को अपनी प्राथमिकता के अनुसार भाषाएँ चुनने की आजादी है।
बिल का उद्देश्य और संभावित प्रभाव
इस बिल का मुख्य उद्देश्य तमिलनाडु में सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं में हिंदी का अनावश्यक उपयोग रोकना है। इसमें निम्न बिंदु शामिल हो सकते हैं।
सरकारी बोर्ड, होर्डिंग्स और साइनबोर्ड में तमिल भाषा का उपयोग अनिवार्य करना। स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में स्थानीय भाषा को प्राथमिकता देना।
हिंदी फिल्मों और गानों पर सीमित प्रभाव या चेतावनी।
सरकार का मानना है कि यह कदम स्थानीय संस्कृति, भाषाई अधिकार और राज्य की पहचान की रक्षा करेगा।
स्थानीय प्रतिक्रिया
तमिलनाडु में जनता और राजनीतिक पार्टियों के बीच इस बिल को लेकर मतभेद हैं। DMK समर्थक इसे राज्य की भाषा और संस्कृति की रक्षा के रूप में देखते हैं, जबकि विपक्ष इसे राजनीति से प्रेरित कदम मानता है। स्थानीय शिक्षक और शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि तीन-भाषा नीति छात्रों के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन भाषा को जबरदस्ती थोपना गलत है। उनकी राय में, यह बिल राज्य के बच्चों को अपनी मातृभाषा में पढ़ाई करने का अधिकार देगा।
विशेष सत्र में पास हो सकता है बिल
विधानसभा का विशेष सत्र 14 अक्टूबर से शुरू हुआ और 17 अक्टूबर को खत्म होगा। इस सत्र में राज्य का अनुपूरक बजट भी पेश किया जाएगा। DMK सरकार की प्राथमिकता यह बिल है, और माना जा रहा है कि यह पास होने की पूरी संभावना है। CM स्टालिन ने स्पष्ट किया है कि राज्य की जनता के अधिकार और स्थानीय भाषा की सुरक्षा उनके लिए सर्वोपरि है। उनका कहना है कि यह कदम केवल तमिलनाडु के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लिए एक मिसाल होगा।