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आधी फीस मिलने पर गाया आधा ही गाना! जानिए ‘किशोर दा’ के 4 सबसे दिलचप्स और अजीबोगरीब किस्से! 

आधी फीस मिलने पर गाया आधा ही गाना! जानिए ‘किशोर दा’ के 4 सबसे दिलचप्स और अजीबोगरीब किस्से! 

किशोर कुमार… एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही चेहरा अपने आप मुस्कुरा उठता है।

13 अक्टूबर 1987 — ये वही दिन था जब हिंदी सिनेमा का ये दीवाना फनकार इस दुनिया को अलविदा कह गया। लेकिन सच कहें तो, वो कहीं गया ही नहीं। वो अब भी जिंदा है — हर पुराने ट्रांजिस्टर की धुन में, हर रेडियो जॉकी की मुस्कान में, और हर दिल में ।

 

किशोर सिर्फ गायक नहीं थे, वो एक एहसास थे — जो हर पीढ़ी को अपनी तरफ खींच लेता है। उनकी आवाज़ में जो नटखटपना था, वो उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। वो गाते नहीं थे, जीते थे गाना।

 

अरे गाने तो हमारे ज़माने में हुआ करते थे…”

 

हम सब अक्सर अपने बड़ों से ये बात सुनते आए है कि

“आज की पीढ़ी के गाने में वो बात कहां! हमारे ज़माने में सुर भी था, लफ्ज़ भी और जज़्बात भी।”

किशोर कुमार का दौर सिर्फ संगीत का नहीं था, वो रूह का दौर था।हर गाने में एक कहानी थी, हर धुन में एक नशा। आज जब तकनीक और बीट्स ने गानों को पैक कर दिया है, किशोर दा के गाने अब भी दिल खोलकर सांस लेते हैं।

 

किशोर दा — जितने जीनियस, उतने ही अजीबोगरीब

 

4 अगस्त 1929 को खंडवा में जन्मे आभास कुमार गांगुली, जिन्हें दुनिया ने “किशोर कुमार” के नाम से जाना, असल में एक किस्सों के किताब थे।

उनके पिता खंडवा के मशहूर वकील थे और बड़े भाई अशोक कुमार पहले से ही फिल्म इंडस्ट्री के चमकते सितारे थे। लेकिन किशोर का सपना कुछ और था — वो अपने भाई से ज़्यादा कमाना चाहते थे और के.एल. सहगल की तरह गाना गाना चाहते थे।

 

कहते हैं, किशोर का टैलेंट जितना बड़ा था, उनका मिज़ाज भी उतना ही निराला।

वो अगर खुश होते तो स्टूडियो में मस्ती मचा देते, और अगर मूड न हो — तो लाख मनाने पर भी गाना नहीं गाते

 

आधी फीस, तो काम भी आधा” — और सच में आधा!

 

उनकी अजीबोगरीब आदतों के किस्से फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर थे। कहते हैं, किशोर दा तब तक कोई गाना नहीं गाते थे जब तक उन्हें पूरी फीस न मिल जाए। एक बार किसी निर्माता ने उन्हें आधी रकम दी — तो किशोर दा ने सच में गाना आधा ही रिकॉर्ड किया और चले गए!

 

उनके घर के बाहर एक बोर्ड टंगा रहता था —

“Beware of Kishore!” (किशोर से सावधान!)

कहते हैं, ये मज़ाक नहीं था… ये उनका अंदाज़ था।

वो हर काम अपने हिसाब से करते थे — और शायद यही बिंदासपन ही उन्हें बाकी सबसे अलग बनाता था।

 

 

 

राजेश खन्ना से पहली मुलाकात वाली सवाल

 

कहते है जब राजेश खन्ना जब पहली बार किशोर कुमार के घर पहुंचे, तो उन्होंने पूछा —

“किशोर दा, मेरे लिए गाना गाएंगे?” किशोर ने मुस्कराकर कहा — “पहले ये बताओ, फिल्मों में काम क्यों करना चाहते हो?”

 

खन्ना साहब बोले — “लोगों की सेवा करना चाहता हूं।”

किशोर दा फिर बोले — “अरे, फिल्मों से कैसी सेवा होगी?” राजेश बोले — “मनोरंजन भी तो एक सेवा है।”

बस, यही जवाब सुनकर किशोर दा मान गए — और गाया वो गीत जिसने सबका दिल जीत लिया —

“मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू…”

यही गाना राजेश खन्ना को ‘सुपरस्टार’ बना गया, और किशोर दा की आवाज़ उनकी पहचान बन गई।

 

 

आवाज़ जो आज भी ज़िंदा है

 

70 और 80 के दशक में किशोर कुमार सबसे महंगे प्लेबैक सिंगर थे।

राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र — सबकी आवाज़ में किशोर का जादू बोलता था।

‘गाता रहे मेरा दिल’, ‘नीले नीले अंबर पर’, ‘मेरे सामने वाली खिड़की में’, ‘मेरे महबूब क़यामत होगी’ — हर गाना एक लाजवाब कहानी कहता है।

 

किशोर दा के जाने के सालों बाद भी जब उनके गाने बजते हैं, तो दिल आज भी वही पुरानी धड़कन महसूस करता है।

क्योंकि कुछ आवाज़ें वक्त से नहीं मरतीं — वो अमर हो जाती हैं।

किशोर दा चले गए, लेकिन वो हर उस मुस्कान में हैं, जो उनकी धुन पर थिरकती है। हर उस बारिश में हैं, जिसमें कोई ‘रिमझिम गिरे सावन’ गुनगुनाता है। और हर उस प्यार में हैं, जो बिना कहे भी सब कह जाता है।

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