शिल्पी – गौतम मर्डर केस: 3 जुलाई 1999 को पटना के फ्रेज़र रोड पर मिली दो अर्धनग्न लाशों ने पूरे बिहार को हिला दिया था।
26 साल बाद शिल्पी–गौतम मर्डर केस फिर चर्चा में है।
प्रशांत किशोर ने उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर लगाए गंभीर आरोप
3 जुलाई की सुबह, शहर के बीचों-बीच फ्रेज़र रोड स्थित क्वार्टर नंबर 12 में एक कार खड़ी थी। शाम होते-होते उस कार से बदबू आने लगी। जब लोग पास पहुंचे तो जो दृश्य सामने था, उसने सबको सन्न कर दिया। कार के अंदर दो लाशें पड़ी थीं, एक लड़की और एक लड़का, दोनों अर्धनग्न अवस्था में। इस घटना को 26 साल हो गए हैं, पर अब फिर से इस घटना को लेकर बातचीत तेज हो गई है। दरअसल, बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने गंभीर आरोप लगाए। प्रशांत किशोर ने दावा किया कि शिल्पी–गौतम रेप और मर्डर केस के कई आरोपियों में सम्राट चौधरी का नाम भी दर्ज था।
पीके ने आरोप लगाया कि उस समय भी सम्राट चौधरी की भूमिका पर कई सवाल उठे थे और वह इस मामले में संदिग्ध अभियुक्त थे। प्रशांत किशोर ने इस केस की सीबीआई जांच का जिक्र करते हुए सीधा सवाल उठाया कि ‘क्या इस मामले में सम्राट चौधरी का सैंपल लिया गया?’ उन्होंने यह भी कहा कि इस केस में सम्राट चौधरी की भूमिका अब भी संदिग्ध है।
हालांकि, सम्राट चौधरी ने इन आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि जिस राकेश कुमार का नाम इस मामले में आया था, वह आइसक्रीम बेचता था। CBI ने इस मामले की जांच की थी। तो फिर सम्राट चौधरी पर ये आरोप क्यों लगाए गए? अब बिहार में इसी महीने चुनाव हैं और राजनीति गलियारों में इसकी चर्चा तेज है, साथ ही अब शिल्पी–गौतम मर्डर केस की कहानी फिर से जनता की जुबान पर आ गई है।ऐसे में आज हम बात करेंगे कि क्या था शिल्पी–गौतम मर्डर केस, क्या है और क्या था मामला।

क्या है शिल्पी–गौतम की कहानी
नाम शिल्पी जैन, शिल्पी पटना के प्रसिद्ध कारोबारी उज्ज्वल कुमार जैन की बेटी थीं। पढ़ाई पटना वीमेंस कॉलेज से की थी और 1998 में ‘मिस पटना’ का खिताब भी जीता था। कॉलेज खत्म होने के बाद वह कंप्यूटर कोचिंग करने लगीं और माडलिंग में भी काफी नाम कमाया। माडलिंग शिल्पी को पसंद था।
27 साल का युवक, नाम गौतम सिंह। गौतम के पिता लंदन में डॉक्टर थे, लेकिन गौतम राजनीति में करियर बनाना चाहते थे। वह पटना में रहते थे और RJD के युवा विंग से जुड़े थे। साधु यादव से उनका करीबी संबंध था, वही साधु यादव जो लालू यादव के साले हैं और उस समय बिहार की राजनीति में उनका दबदबा था।
शिल्पी और गौतम के बीच प्रेम प्रसंग चल रहा था; दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे।
क्या हुआ था 3 जुलाई 1999 को
सुबह शिल्पी हमेशा की तरह कोचिंग के लिए निकलीं। रास्ते में गौतम के एक दोस्त से मुलाकात हुई, जो कार में था। उसने कहा, ‘मैं तुम्हें छोड़ देता हूं।’शिल्पी उसे जानती थीं, इसलिए बैठ गईं। लेकिन कार कोचिंग सेंटर की बजाय दूसरी दिशा में मुड़ गई। जब शिल्पी ने पूछा, तो उस दोस्त ने कहा — “गौतम वाल्मी गेस्ट हाउस में है, वहीं चलो।” शिल्पी को लगा शायद कोई काम होगा, तो वह चली गईं। लेकिन यह वही वाल्मी गेस्ट हाउस था, यह गेस्ट हाउस कई नेताओं की अय्याशी के अड्डे के रूप में बदनाम था। कई बड़े नेता यहाँ आए थे। शिल्पी जब वहां पहुंचीं तो वह हैरान रह गईं।
ऐसा क्या हुआ वाल्मी गेस्ट हाउस में
गौतम को जब पता चला कि शिल्पी को गेस्ट हाउस ले जाया गया है, वह तुरंत वहाँ पहुंचे। अंदर का नज़ारा देखकर वह हैरान रह गए। शिल्पी से जबरदस्ती की जा रही थी, उसके कपड़े फटे हुए थे और वह रो रही थी। गौतम ने बचाने की कोशिश की, लेकिन उसे पकड़कर बुरी तरह पीटा गया। कहा जाता है कि उस वक्त गेस्ट हाउस में कुछ प्रभावशाली लोग मौजूद थे।
गौतम और शिल्पी दोनों पर अत्याचार हुआ। शिल्पी के साथ गैंग रेप किया गया और बाद में शिल्पी और गौतम की हत्या कर दी गई।
कुछ घंटों बाद
शाम तक शिल्पी घर नहीं लौटीं, तो परिवार चिंतित हो गया। ढूंढते-ढूंढते मामला थाने तक पहुंचा। लेकिन इससे पहले रात करीब 9:30 बजे, पुलिस को खबर मिली कि गांधी मैदान के पास साधु यादव के क्वार्टर के गैराज में एक कार खड़ी है, जिसमें दो लाशें हैं। पुलिस पहुंची तो देखा कार में शिल्पी और गौतम की लाशें थीं।
गौतम के शरीर पर सिर्फ़ पैंट थी, जबकि शिल्पी पर सिर्फ़ टी-शर्ट। कपड़े कार में बिखरे पड़े थे। अजीब बात यह थी कि पुलिस पहुंचने के कुछ ही देर बाद साधु यादव खुद वहाँ पहुंच गए, जबकि आधिकारिक रूप से अभी किसी को लाश की पहचान की जानकारी नहीं दी गई थी।
पुलिस ने मामले में की जल्दबाजी
पुलिस ने बिना ज्यादा जांच किए दोनों शवों को अस्पताल भेज दिया और गाड़ी को एक सिपाही चलाकर थाने ले गई, जिससे सारे फिंगरप्रिंट्स मिट गए। बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के ही सिटी एसपी मनविंदर सिंह भाटिया ने बयान दिया कि दोनों की मौत कार्बन मोनोऑक्साइड गैस से दम घुटने (Asphyxiation) से हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दोनों कार में संबंध बना रहे थे।’ यानि पुलिस ने पूरा मामला ही बदल दिया।पुलिस के बयान आते ही विपक्ष और मीडिया ने सवाल उठाए — इतनी जल्दी फैसला कैसे? सबूत मिटाने की जल्दी क्यों? क्या किसी को बचाने की कोशिश हो रही है? और यही सब सवाल जनता के मन में भी घर बनाने लगे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या
28 जुलाई 1999 को आई विसरा रिपोर्ट ने पुलिस के दावे को झटका दिया।
रिपोर्ट में पाया गया कि दोनों के शरीर में एल्युमिनियम फॉस्फाइड नामक जहरीला पदार्थ था, यानी दोनों को जहर दिया गया था। कार्बन मोनोऑक्साइड का कोई असर नहीं मिला। साथ ही फॉरेंसिक जांच में पता चला कि शिल्पी के कपड़ों पर दो अलग-अलग लोगों के सीमेन के निशान थे। यानी उसके साथ एक से अधिक लोगों ने संबंध बनाए थे।
यह रिपोर्ट जैसे ही सामने आई, राजनीति में तूफ़ान मच गया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार और पुलिस साधु यादव को बचाने में लगी हुई है, क्योंकि यह पूरी घटना वहीँ घटित हुई थी।
CBI जांच में क्या हुआ
पुलिस की शुरुआती जांच में कुछ खास पता नहीं लगा, जिससे दबाव बढ़ गया। दबाव बढ़ने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने केस CBI को सौंप दिया। CBI ने जांच शुरू की, लेकिन तब तक बहुत से सबूत पुलिस पहले ही नष्ट कर चुकी थी।
CBI ने गौतम के दोस्तों मनीष, राकेश, पंकज, एसपी सिंह और अशोक यादव के ब्लड सैंपल लिए और DNA टेस्ट कराया। किसी का मेल नहीं हुआ। CBI ने साधु यादव से भी ब्लड सैंपल देने को कहा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘मेरे खिलाफ साजिश हो रही है।’ जिसके बाद साधु यादव ने सैंपल नहीं दिया।
संविधान के अनुच्छेद 20(3) कहता है कि कोई आरोपी खुद के खिलाफ सबूत देने को मजबूर नहीं किया जा सकता। CBI ने कोर्ट से सैंपल लेने का आदेश भी नहीं मांगा। साल 2004 में CBI ने केस बंद कर दिया और कहा “ये सुसाइड केस है।” CBI के अनुसार, दोनों ने खुद जहर खाया था। लेकिन रिपोर्ट में कई चीज़ें अधूरी थीं।
सवाल जिसका जवाब आज तक नहीं मिला
• अगर आत्महत्या थी, तो दोनों अर्धनग्न क्यों थे?
• पुलिस को सूचना देने वाला कौन था?
• साधु यादव घटनास्थल पर इतनी जल्दी कैसे पहुंचे?
• और अगर शिल्पी पर दो लोगों के निशान मिले थे, तो दूसरा व्यक्ति कौन था?
लेकिन इन सवालों का जवाब कभी नहीं मिला।
शिल्पी के भाई प्रशांत जैन ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की। लेकिन 2006 में उनकी किडनैपिंग हो गई। कुछ दिनों बाद उन्हें छोड़ दिया गया, लेकिन उन्होंने केस आगे नहीं बढ़ाया। इसके बाद यह मामला धीरे-धीरे ख़ामोशी में दब गया। न तो शिल्पी–गौतम को इंसाफ मिला, न आरोपियों की पहचान हो पाई।
अब बिहार में चुनाव हैं और ऐसे में यह मामला फिर से राजनीतिक गलियों में चर्चा का विषय बन गया है।