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सरकार का दावा “99% मोबाइल मेड इन इंडिया !” लेकिन सच्चाई जानकर चौंक जाएंगे,असली कहानी जानिए

सरकार का दावा "99% मोबाइल मेड इन इंडिया

सरकार का दावा है कि भारत में बिकने वाले 99.2% मोबाइल फोन अब ‘मेड इन इंडिया’ हैं।

क्या ये फोन पूरी तरह भारत में बनते हैं? जानिए असेंबली से लेकर आत्मनिर्भरता तक भारत की मोबाइल निर्माण यात्रा और ‘मेड इन इंडिया’ की असल सच्चाई।

 

भारत में मोबाइल निर्माण पिछले एक दशक में तेजी से बदला है, 2014 में जहाँ तकरीबन हर दूसरा मोबाइल चीन या ताइवान से आता था, वहीं आज सरकार दावा कर रही है कि भारत में बेचे जाने वाले 99.2% मोबाइल फोन ‘मेड इन इंडिया’ हैं। सवाल उठता है कि जब दुनिया की दिग्गज कंपनियाँ ,जैसे चीन की Xiaomi, जापान की Sony या अमेरिका की Apple, आज भी मार्केट पर हावी हैं, तो आखिर 99% मोबाइल

‘मेड इन इंडिया’ कैसे हो गए?

क्या है ‘ मेड इन इंडिया’ की हकीकत

मेड इन इंडिया सुनने में बहुत बड़ा दावा है, लेकिन इसका अर्थ पूरी तरह से भारत में निर्मित फोन नहीं होता। दरअसल, मोबाइल निर्माण में कई चरण होते हैं डिज़ाइन, कंपोनेंट निर्माण, असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग। अभी भारत में ज़्यादातर कंपनियाँ असेंबली और पैकेजिंग का काम करती हैं, जबकि चिप, कैमरा, डिस्प्ले, बैटरी जैसे अहम कंपोनेंट्स अब भी चीन, ताइवान, कोरिया या जापान से आते हैं। एक मोबाइल को 100 हिस्सों में बांट दें, तो 70-80 हिस्से अब भी आयातित हो सकते हैं — लेकिन फोन को भारत में असेंबल करने के कारण उस पर ‘मेड इन इंडिया’ टैग लग जाता है।

सरकार का दावा और तेजी से बढ़ता उत्पादन

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में कहा कि भारत अब मोबाइल निर्माण का वैश्विक केंद्र बन चुका है। उनके अनुसार,
“आज भारत में बिकने वाले 99.2% मोबाइल फोन देश में ही बन रहे हैं।”
यह बदलाव आकंड़ों में भी दिखता है। 2014 में भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन का मूल्य लगभग ₹1.9 ट्रिलियन था, जो 2023-24 में बढ़कर ₹9.5 ट्रिलियन हो गया। यही नहीं, भारत का मोबाइल निर्यात भी 47% की दर से बढ़ा है। पहले जहाँ मोबाइल आयात का खर्च बढ़ता जा रहा था, अब भारत मोबाइल निर्यातक देश के रूप में उभर रहा है।

इसका बड़ा असर

भारत सरकार की Make in India और Production Linked Incentive योजनाओं ने इस बदलाव में सबसे अहम भूमिका निभाई है। PLI स्कीम के तहत उन कंपनियों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाता है जो भारत में मोबाइल उत्पादन बढ़ाती हैं। इसके चलते Samsung, Apple, Xiaomi, Oppo, Vivo, Foxconn, Pegatron और Dixon Technologies जैसी कंपनियों ने भारत में अपने असेंबली यूनिट स्थापित किए हैं। Foxconn, जो Apple का प्रमुख निर्माण साझेदार है, अब भारत में iPhone असेंबल कर रहा है। इसी तरह Google ने भी घोषणा की है कि वह अपने Pixel फोन भारत में Foxconn के साथ मिलकर बनाएगा।

इसका असर बड़े पैमाने पर यह हुआ कि भारत में आज 200 से ज़्यादा मोबाइल निर्माण इकाइयाँ काम कर रही हैं । जो 2014 में मुश्किल से 2-3 थीं।

चीनी कंपनियों की रणनीति

भारत में हुए राजनीतिक तनाव और कर जांच के बाद चीन की कंपनियाँ अब खुद असेंबली नहीं कर रहीं, बल्कि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को यह काम दे रही हैं। सूत्रों के अनुसार,चीन की स्मार्टफोन कंपनियाँ अब लगभग 66% असेंबली कार्य भारतीय कॉन्ट्रैक्ट निर्माताओं को आउटसोर्स कर रही हैं।

जैसे, Dixon Technologies, Bharat FIH और Lava जैसी कंपनियाँ इन विदेशी ब्रांडों के लिए मोबाइल असेंबल करती हैं। इस तरह फोन भले ही Xiaomi या Realme के नाम से बिके, लेकिन वह भारत की फैक्ट्रियों में तैयार होता है और यही ‘मेड इन इंडिया’ की गणना में शामिल हो जाता है।

भारत बनाम चीन

वैश्विक स्तर पर भी माहौल भारत के पक्ष में जा रहा है। अमेरिका और यूरोप के साथ चीन के व्यापारिक तनाव के चलते कई कंपनियाँ अपनी निर्भरता चीन से कम कर रही हैं । इसे ‘China+1 स्ट्रेटजी ‘ कहा जाता है। भारत अपनी बड़ी आबादी, सस्ते श्रमबल, और नीति स्थिरता के कारण इस रणनीति का सबसे मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। इससे भारत की मोबाइल इंडस्ट्री को तेज़ी से विदेशी निवेश मिलने लगा है, और कंपनियाँ अब भारत को न सिर्फ अपने घरेलू बाज़ार के लिए, बल्कि निर्यात के लिए भी एक निर्माण केंद्र के रूप में देख रही हैं।

भारत में आज लगभग सभी मोबाइल की असेंबली घरेलू स्तर पर हो रही है। यह एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन यह सच भी है कि मोबाइल का अधिकांश ‘दिल-दिमाग’ यानी चिपसेट, कैमरा मॉड्यूल, डिस्प्ले और बैटरी अब भी विदेश से आते हैं।

Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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