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क्या सच में ‘बुर्का’ बन रहा फर्जी वोटिंग का हथियार? बिहार की राजनीति में बुर्का बनाम घूँघट की एंट्री! 2025

बिहार में विधान सभा का बिगुल बज चुका है और जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव की तारीख नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे सियासी बयानबाज़ी और विवाद भी तेज़ होते जा रहे हैं। चुनाव से पहले ही राज्य की राजनीति में ‘ बुर्का बनाम घूंघट ‘ का मुद्दा है।

बुर्का

यह विवाद तब शुरू हुआ जब भाजपा ने यह मांग उठाई कि मतदान केंद्रों पर बुर्का या पर्दा पहनकर आने वाली महिलाओं की पहचान उनके मतदाता पहचान पत्र से मिलाई जानी चाहिए, ताकि फर्जी मतदान को रोका जा सके। भाजपा के इस प्रस्ताव के बाद विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश बताया और पार्टी पर निशाना साध रहे है।

बुर्का पहनकर आने वाली महिलाओं की हो जांच

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने कहा था कि “पार्टी ने चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि आगामी विधानसभा चुनाव एक या दो चरणों में कराए जाएं। इसके साथ ही उन्होंने विशेष तौर पर बुर्का पहनकर आने वाली महिला मतदाताओं की पहचान की जांच की मांग की, ताकि वोटिंग प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे और किसी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश न हो। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि “वोट डालना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन सही पहचान सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के हित में ज़रूरी है।”

भाजपा बना रही अल्पसंख्यक महिलाओं को निशाना – विपक्ष

इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने भाजपा पर अल्पसंख्यक महिलाओं को निशाना बनाने का आरोप लगाया। RJD के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि “भाजपा इस मुद्दे को उठाकर चुनावी ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि “चुनाव आयोग की प्रक्रिया पहले से ही पारदर्शी है और हर मतदाता की पहचान जांची जाती है।” ऐसे में इस तरह की मांग केवल धार्मिक भावनाओं को भड़काने के लिए की जा रही है।

बुर्का बनाम घूँघट

तो वहीं दूसरी तरफ बिहार सरकार के गन्ना उद्योग मंत्री कृष्णनंदन पासवान का बयान में उन्होंने कहा कि अगर मतदान केंद्रों पर बुर्का की अनुमति दी जाती है, तो घूंघट को भी समान अधिकार मिलना चाहिए। पासवान ने कहा कि “जब एक समुदाय की महिलाएं अपने धार्मिक या पारंपरिक पहनावे में मतदान कर सकती हैं, तो दूसरे समुदाय की महिलाओं को भी वही सुविधा दी जानी चाहिए।”

मोतिहारी में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि “पार्टी के शीर्ष नेताओं ने यह बात चुनाव आयोग की बैठक में भी उठाई थी कि मतदाताओं की पहचान उनके चेहरे से मिलान कराई जानी चाहिए। अगर चेहरा ढका हुआ है, तो पहचान मुश्किल हो जाती है, और ऐसे में फर्जी वोटिंग की संभावना बढ़ती है।

आयोग ने दिया आश्वासन

हालांकि, इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि सभी मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक प्रबंध किए जाएंगे, ताकि किसी को असुविधा न हो और मतदान प्रक्रिया भी बाधित न हो।

पर्दा या घूंघट पहचानने के लिए सेविकाएं

इस बार आयोग ने निर्णय लिया है कि लगभग 90 हजार मतदान केंद्रों पर आंगनबाड़ी सेविकाओं को तैनात किया जाएगा। ये सेविकाएं उन महिला मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करेंगी जो पर्दा या घूंघट में आती हैं। इस प्रक्रिया में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय की सेविकाएं शामिल होंगी, ताकि किसी तरह का भेदभाव न हो।

बिहार में यह विवाद धीरे-धीरे राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। जहां भाजपा इसे चुनावी पारदर्शिता का मामला बता रही है, वहीं विपक्ष इसे धार्मिक और सामाजिक भावनाओं से जुड़ा मुद्दा कह रहा है।यह पहली बार नहीं है जब मतदान के दौरान महिलाओं के पहनावे को लेकर बहस छिड़ी हो। कई राज्यों में पहले भी यह चर्चा उठ चुकी है कि चेहरा ढके होने की स्थिति में मतदाता की पहचान कैसे सुनिश्चित की जाए।

चुनाव आयोग के सामने चुनौती

हालांकि, चुनाव आयोग हमेशा यह कहता आया है कि उसकी प्राथमिकता हर नागरिक को मतदान के अधिकार का सुरक्षित उपयोग करने देना है। बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या काफी बड़ी है, और इनमें से बहुत-सी महिलाएं अब भी पारंपरिक पोशाक और पर्दा प्रथा का पालन करती हैं। ऐसे में आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पहचान की प्रक्रिया पारदर्शी रहे, लेकिन साथ ही किसी की धार्मिक या सामाजिक भावना को ठेस न पहुंचे।

बिहार में दो चरणों में चुनाव होंगे। पहला चरण का मतदान 6 नवंबर और दूसरा चरण का मतदान 11 नवंबर को होगा। वहीं, मतगणना 14 नवंबर को की जाएगी।

 

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Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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