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क्या आप भी अपने मानसिक स्वास्थ्य को नजर अंदाज कर रहे है ? WHO ने जारी किए चौंकाने वाले आँकड़े !

मानसिक स्वास्थ्य अब बातचीत का एक अहम हिस्सा बन चुका है, खासकर जनरेशन ज़ेड के बीच। सोशल मीडिया से लेकर ऑफिस और कॉलेजों तक, अब यह विषय खुलकर चर्चा में है। पहले जहां मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना एक तरह से टैबू माना जाता था, वहीं आज युवा पीढ़ी इसे सामान्य मानकर स्वीकार कर रही है।

मानसिक स्वास्थ्य

‘ज़्यादा बातें, कम काम’ वाला विषय

कई बार यह देखा गया है कि लोग सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बात करते हैं, पोस्ट लिखते हैं, या ‘सेल्फ-केयर’ के टिप्स शेयर करते हैं, लेकिन जब असली ज़रूरत होती है। किसी को प्रोफेशनल मदद देने की या खुद लेने की तो रास्ते बहुत सीमित मिलते हैं। मानसिक स्वास्थ्य एक ‘ज़्यादा बातें, कम काम’ वाला विषय बनकर रह गया है। आज की पीढ़ी, यानी जनरेशन ज़ेड, ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ी क्रांति की है। उन्होंने बातचीत को सामान्य बनाया है।

अब स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों में वेलनेस सत्र, थैरेपी पर चर्चा और भावनात्मक स्वास्थ्य के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लेकिन जब हम आंकड़ों पर नज़र डालते हैं, तो भारत की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली दिखती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के अनुसार, भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ 2,443 ‘डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ इयर्स’ प्रति 1 लाख जनसंख्या पर है।

बेहतर सिस्टम बनाने की जरूरत

इन आंकड़ों से यह साफ है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बातचीत बढ़ी है, लेकिन मदद के साधन अब भी सीमित हैं। भारत में थेरेपी अब भी महंगी है। छोटे शहरों में तो अच्छे मनोवैज्ञानिक या काउंसलर मिलना ही मुश्किल है। सरकारी अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं या तो बहुत कम हैं या फिर उनकी स्थिति खराब है। निजी क्लीनिकों की फीस बहुत ज़्यादा होती है, जिससे आम लोग वहां तक नहीं पहुंच पाते। ऑफिस और कार्यस्थलों में भी अब मानसिक स्वास्थ्य पर बात होने लगी है। कई कंपनियां वर्कशॉप या ‘मेंटल हेल्थ डे’ मनाती हैं, लेकिन असली सपोर्ट सिस्टम अब भी अधूरा है। कर्मचारियों को बर्नआउट, तनाव या अवसाद के समय पर कोई ठोस नीति या छुट्टी का विकल्प नहीं मिलता। कई बार कर्मचारी सिर्फ़ ‘वेलनेस एक्टिविटी’ तक सीमित रह जाते हैं, जो दिखावे से ज़्यादा कुछ नहीं होती।

मानसिक स्वास्थ्य

जागरूकता की कमी

दूसरी तरफ, समाज में अब भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता नहीं है। अगर कोई व्यक्ति यह कहे कि उसे चिंता, अवसाद या नींद की समस्या है, तो बहुत लोग उसे कमज़ोर या ज़्यादा सोचने वाला कह देते हैं। ये शब्द मामूली लग सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के लिए ये बेहद हानिकारक साबित हो सकते हैं। क्योंकि ऐसे माहौल में लोग मदद लेने से झिझकते हैं। वे अपनी भावनाओं को भीतर दबा लेते हैं, जो बाद में और बड़ी समस्याओं का कारण बन जाता है।

मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही ज़रूरी

अगर हम लगातार थकान, चिड़चिड़ापन या नकारात्मकता महसूस कर रहे हैं, तो उसे नजरअंदाज न करें। मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही ज़रूरी है। जैसे हम बुखार या दर्द के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मन की परेशानी के लिए मनोचिकित्सक या काउंसलर से मिलना बिल्कुल सामान्य बात है।

हर साल 10 अक्टूबर को दुनिया भर में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस

(World Mental Health Day) मनाया जाता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की शुरुआत 1992 में हुई थी। इस पहल सबसे पहले वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ (WFMH) ने की थी, और इसके पीछे सबसे प्रमुख नाम था। रिचर्ड हंटर, जो उस समय संगठन के उप महासचिव थे। इसके पीछे उनका एक उद्देश्य था। उनका उद्देश्य था, मानसिक स्वास्थ्य को लेकर वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाना, समाज में मौजूद पूर्वाग्रहों को कम करना, और इसके लिए सरकारों, संगठनों व आम जनता को एकजुट करना।

आज के समय में सोशल मीडिया एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। अगर इसका इस्तेमाल सही तरीके से किया जाए तो यह जागरूकता फैलाने का सबसे ताकतवर माध्यम है। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि ‘रियल लाइफ’ में कदम उठाना भी ज़रूरी है। सिर्फ़ पोस्ट या रील बनाने से बदलाव नहीं आएगा, असली बदलाव तब आएगा जब हम मदद के रास्ते बनाएंगे नीतियों से लेकर व्यवहार तक।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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