कांशीराम ने दलित और पिछड़े समाज को संगठित कर राजनीति में नई पहचान दिलाई।
बीएसपी के संस्थापक और मायावती के गुरु की कहानी और उनकी सोच जानें।
लखनऊ में आज बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने अपने संस्थापक कांशीराम की 19वीं पुण्यतिथि के अवसर पर एक विशाल रैली का आयोजन किया है।
यह रैली केवल श्रद्धांजलि का कार्यक्रम नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले बसपा के शक्ति प्रदर्शन मंच भी है। मायावती इस रैली के ज़रिए दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों की एकजुटता दिखाने के साथ कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश कर रही है।
कौन थे कांशीराम?
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम भारतीय राजनीति में उस दौर के नेता थे जिन्होंने दलित आंदोलन को नई दिशा और पहचान दी l
रोपड़ ज़िले के खवासपुर गांव में जन्मे कांशीराम का परिवार दलित था, लेकिन सामाजिक भेदभाव से तंग आकर उन्होंने सिख धर्म अपना लिया। सिख धर्म अपनाने से उन्हें ऊँची जातियों के बराबरी का दर्जा तो नहीं मिला, परंतु अपमान और दमन से मुक्ति का अनुभव ज़रूर हुआ।
1956 में स्नातक करने के बाद उन्होंने 1958 में पुणे के पास डीआरडीओ (DRDO) में लैब असिस्टेंट की नौकरी शुरू की। यहीं उन्होंने नज़दीक से देखा कि अनुसूचित जातियों के लोग किस तरह सामाजिक और आर्थिक शोषण का शिकार हो रहे हैं। यह अनुभव उनके जीवन का मोड़ साबित हुआ।
दलित राजनीति के शिल्पकार
कांशीराम ने दलित समाज के हक़ और हुकूक की लड़ाई को संगठित रूप देने के लिए पहले डीएस-4 (Dalit Shoshit Samaj Sangharsh Samiti) और फिर बामसेफ (BAMCEF) की स्थापना की। इसके बाद 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) का गठन किया — जो आगे चलकर भारत की प्रमुख राजनीतिक ताकतों में से एक बनी।
उन्होंने अपने संघर्ष में न केवल खुद नेतृत्व किया, बल्कि मायावती जैसी नई पीढ़ी की नेता को भी तैयार किया, जो आज बसपा का चेहरा हैं।
कांशीराम की नीतियां और विचारधारा
कांशीराम की राजनीति सामाजिक न्याय, समान प्रतिनिधित्व और आत्मसम्मान पर आधारित थी।
उनकी प्रमुख नीतियों और विचारों में शामिल थे —
“बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” – यानी समाज के बहुसंख्यक तबके का कल्याण ही राष्ट्र की सच्ची प्रगति है।
राजनीतिक सशक्तिकरण के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, ताकि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें।
जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष, और शिक्षा को समानता का सबसे बड़ा हथियार मानना।
अंबेडकरवादी नीति को आगे बढ़ाते हुए “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के सिद्धांत को जनआंदोलन का आधार बनाना।
उनका मानना था कि “दलितों की हालत सुधारने के लिए केवल आरक्षण नहीं, बल्कि सत्ता में भागीदारी आवश्यक है।”
राजनीति में नई चेतना का उदय
कांशीराम के उदय से पहले दलित राजनीति मुख्य रूप से कांग्रेस और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया तक सीमित थी। कांशीराम ने इस सीमित दायरे को तोड़ते हुए बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से संगठित और जागरूक किया।
उन्होंने समाज को सिखाया कि सत्ता तक पहुंचना ही सामाजिक मुक्ति का असली रास्ता है।
आज जब लखनऊ में हजारों समर्थक एकजुट होकर कांशीराम को श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तो यह केवल एक स्मृति नहीं बल्कि उनकी विचारधारा की निरंतरता का प्रतीक है।
कांशीराम का संदेश आज भी राजनीति की दिशा तय करता है
“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।”