टाटा समूह के मालिक होकर भी कारखाने में क्यों काम करते थे रतन टाटा?
नई दिल्ली। आज, 9 अक्टूबर को देश अपने प्रिय उद्योगपति और प्रेरणास्रोत रतन एन. टाटा को उनकी पहली पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दे रहा है। पिछले साल इसी दिन उनका निधन हुआ था, लेकिन उनकी यादें, उनके विचार और उनका मानवीय दृष्टिकोण आज भी उतना ही जीवंत हैं, जितना उनके रहते थे।
28 दिसंबर 1937 को जन्मे रतन टाटा का जीवन केवल व्यापारिक सफलताओं की कहानी नहीं, बल्कि नैतिकता, विनम्रता और असाधारण दूरदर्शिता की मिसाल है। उनके जीवन की नींव उनकी दादी लेडी नवाजबाई टाटा ने रखी, जिन्होंने उन्हें सेवा और संवेदनशीलता के संस्कार दिए।
1962: भारत लौटकर, कारखानों से शुरू किया नया अध्याय
अपनी दादी की तबियत खराब होने पर वह 1962 में अमेरिका की नौकरी छोड़कर भारत लौट आए। टाटा समूह में उन्होंने सबसे निचले स्तर से काम करना शुरू किया — कारखानों में, मजदूरों के बीच। यह अनुभव बाद में उनके नेतृत्व की पहचान बना।
उन्होंने अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से वास्तुकला में डिग्री हासिल की। लॉस एंजिल्स में काम करते हुए उनके जीवन में कैरोलिन एमोंस के रूप में एक खूबसूरत, लेकिन अधूरा अध्याय जुड़ा। हालात ऐसे बने कि उन्हें अलग होना पड़ा। यह अनकहा रिश्ता रतन टाटा की भावनात्मक गहराई का प्रतीक बन गया।
टाटा समूह से भी बड़ा था उनका विज़न
जब वे 1991 में टाटा संस के चेयरमैन बने, तो उन्होंने समूह को वैश्विक पहचान दिलाई। उनके जाने के बाद भी टाटा ट्रस्ट्स और टाटा समूह में उनकी सोच एक मार्गदर्शक की तरह मौजूद है। हालांकि निधन के बाद ट्रस्ट्स के भीतर मतभेदों की खबरें आईं, लेकिन उनके मूल सिद्धांत — भरोसा, नैतिकता और समाजसेवा — आज भी समूह की आत्मा बने हुए हैं।
ज़मीनी इंसानियत में बसता था असली नेतृत्व
रतन टाटा का व्यक्तित्व उनकी सादगी में बसता था। उनका मानना था कि लीडरशिप का मतलब केवल प्रबंधन नहीं, बल्कि लोगों से गहरा जुड़ाव होना चाहिए। यही जुड़ाव उन्हें अन्य उद्योगपतियों से अलग करता था।
1962 में टाटा समूह के साथ अपना सफर शुरू करने वाले रतन टाटा दशकों तक अपनी कर्मनिष्ठा से उस नाम को विश्वास का पर्याय बना गए। उन्हें अक्सर मुंबई के कोलाबा में आम लोगों के बीच देखा जाता था, जो उनकी ज़मीनी इंसानियत का प्रमाण था।