सुप्रीम कोर्ट ने 1988 के बिहार केस में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का घटना स्थल पर मौजूद होना यह साबित नहीं करता कि वह अवैध भीड़ का हिस्सा है। जब तक यह सिद्ध न हो कि उसने भीड़ के उद्देश्य को समझा और उसमें भाग लिया, तब तक उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि अधूरे सबूतों पर सजा देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि “किसी व्यक्ति का किसी घटना स्थल पर मौजूद होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह भीड़ का हिस्सा है। जब तक यह सिद्ध न हो कि उसने भीड़ केउद्देश्य को समझा और उसमें भागीदारी की, तब तक उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
साक्ष्यों की गहराई से हो जांच
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह बात 1988 के बिहार के एक मामले की सुनवाई के दौरान कही, जिसमें हत्या और अवैध सभा के आरोप में दोषी ठहराए गए 12 लोगों को बरी कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि जब किसी मामले में बहुत से लोगों पर आरोप लगाए जाएं, तो अदालतों को साक्ष्यों की गहराई से जांच करनी चाहिए, विशेषकर जब सबूत स्पष्ट न हों।
पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 149 तभी लागू होती है जब यह साबित हो कि आरोपी ने अवैध सभा के साझा उद्देश्य को स्वीकार किया या उसमें सहयोग किया। सिर्फ मौजूदगी से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
ये न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ
कोर्ट ने चेतावनी दी, कि केवल शक या अधूरे सबूतों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि “हर परिस्थिति की सटीक और कठोर जांच जरूरी है, वरना निर्दोष व्यक्ति को सजा मिल सकती है, जो न्याय के मूल भावना के विपरीत है।”