भोजपुरी स्टार पवन सिंह और उपेंद्र कुशवाहा की नज़दीकी से एनडीए को नया जातीय संतुलन मिल सकता है, 3.45% राजपूत और 4.21% कुशवाहा वोट बैंक का संगम बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।

भोजपुरी सिनेमा के स्टार और अब राजनीति के नए खिलाड़ी पवन सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कभी उपेंद्र कुशवाहा के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले पवन सिंह की उनसे हालिया मुलाकात ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी है। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर में पवन सिंह झुके हुए दिख रहे हैं और कुशवाहा उन्हें गले लगा रहे हैं।
तेज प्रताप का तंज़
तेज प्रताप यादव ने तंज कसते हुए कहा, “पवन सिंह तो झुकते ही रहते हैं। तो, वहीं पवन सिंह ने ट्वीट पर सफाई देते हुए लिखा कि उनके लिए “इंसानियत मायने रखती है और अगर किसी बड़े को प्रणाम करना झुकना कहलाता है तो वे इसे अपना संस्कार मानते हैं।”
पवन सिंह ने दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की, जिसके बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि वे इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार के रूप में उतर सकते हैं। चर्चा है कि वे आरा या अररिया सीट से चुनाव लड़ सकते हैं।

पिछली बार पवन सिंह ने काराकाट से निर्दलीय चुनाव लड़कर कुशवाहा को नुकसान पहुंचाया था। इस बार दोनों के साथ आने से एनडीए को राजपूत और कुशवाहा वोट बैंक में मजबूती मिलने की उम्मीद है। राजपूत समाज में पवन सिंह की पकड़ मजबूत है, वहीं कुशवाहा समुदाय की जड़ें कोइरी-कुर्मी मतदाताओं तक जाती हैं। अगर ये दोनों वर्ग एकजुट होते हैं, तो शाहाबाद, भोजपुर, बक्सर, कैमूर और रोहतास जैसे इलाकों में बीजेपी को सीधा फायदा मिल सकता है।

विवादों का साया
आपको बता दें, पवन सिंह का राजनीतिक सफर विवादों से अछूता नहीं रहा है। उन पर महिला कलाकारों से अभद्र व्यवहार करने के भी आरोप लगते रहे है ।
•पत्नी से अलगाव, पहली पत्नी की आत्महत्या ।
•डबल मीनिंग गाने गाकर फेम हासिल करना ।
पवन सिंह के पास जनता से जुड़ाव और लोकप्रियता दोनों हैं। विवादों के बावजूद उनका जनाधार कायम है। बीजेपी को उम्मीद है कि यह “राजपूत-कुशवाहा फॉर्मूला” आगामी विधानसभा चुनाव में उसकी नैया पार लगा सकता है।