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क्या गांधी और काँग्रेस चाहते तो रुक सकती थी भगत सिंह की फांसी ?

एक तरफ हिंसा और क्रांति का रास्ता दूसरी ओर अहिंसा और समझौते की नीति- 1931 में भगत सिंह की फांसी ने कांग्रेस गांधी और नेहरू को गहरे सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया

भगत सिंह की फांसी

आजादी की लड़ाई में दो विपरीत धाराओं, अहिंसा और क्रांति, का प्रतिनिधित्व करने वाले दो महान नेताओं को हमेशा साथ याद किया जाता है—महात्मा गांधी और भगत सिंह। जहां गांधी ने 1915 में भारत लौटने के बाद सत्याग्रह का मार्ग अपनाया, वहीं 1907 में जन्मे भगत सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खुले तौर पर सशस्त्र विद्रोह का रास्ता चुना। उद्देश्य एक ही था—देश को शोषण और अत्याचार से मुक्त कराना। मगर, 23 मार्च 1931 की घटना ने एक गहरी दरार पैदा कर दी, जिसके सवाल आज भी प्रासंगिक हैं।

लालाजी की मौत का बदला और सांडर्स हत्याकांड

भगत सिंह को 1928 में लाला लाजपत राय की मौत ने भीतर तक झकझोर दिया। इस गुस्से ने उन्हें एक्शन लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पुलिस अफसर जे.पी. सांडर्स को मार गिराया।
इसके बाद, 1929 में, भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। उनकी मंशा किसी की जान लेना नहीं, बल्कि “बहरी सरकार को अपनी आवाज़ सुनाना” थी। गिरफ्तारी के बाद उन पर सांडर्स हत्याकांड का मुकदमा चला। अंततः, 23 मार्च 1931 को उन्हें राजगुरु और सुखदेव के साथ फांसी दे दी गई।

गांधी और कांग्रेस की भूमिका पर उठे सवाल

भगत सिंह की फांसी के बाद, महात्मा गांधी और कांग्रेस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। फांसी से कुछ समय पहले ही, गांधी ने वाइसराय लॉर्ड इरविन के साथ गांधी-इरविन समझौता (1931) किया था। इस समझौते के तहत अहिंसक आंदोलनकारियों को तो रिहा किया गया, लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की सजा को माफ़ करने या टालने की शर्त को मजबूती से शामिल नहीं किया गया।
आलोचकों ने उस समय तीखे सवाल किए: “गांधी को साफ़ कहना चाहिए था कि अगर भगत सिंह की फांसी नहीं रुकेगी तो समझौता भी नहीं होगा।” कई लोगों ने गांधी पर आरोप लगाया कि उन्होंने सिर्फ़ फांसी की सजा टालने की कोशिश की, उसे खत्म करने की नहीं।

लोगों का प्रदर्शन

भगत सिंह की फांसी ने देश की जनता में गहरा गुस्सा और निराशा भर दी। जब गांधी कराची कांग्रेस अधिवेशन में पहुंचे, तो उनका स्वागत लोगों के नारों और विरोध के प्रतीक काले कपड़ों से बने फूल से किया गया। स्वयं गांधी ने इस आक्रोश को स्वीकार किया
जवाहरलाल नेहरू का रुख इस मामले पर भावनात्मक था। उन्होंने भगत सिंह के हिंसक तरीक़े से सहमति नहीं जताई, लेकिन उनकी बहादुरी के वह मुरीद थे। फांसी के अगले दिन नेहरू ने दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि हिंदुस्तान अपने “सबसे प्यारे बेटों को भी बचा न सका,” और यह हमारी ‘लाचारी’ का सबूत है।

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत ने आज़ादी की लड़ाई को एक नई ऊर्जा दी। गांधी की नैतिक राजनीति और नेहरू की भावनात्मक व्यथा के बीच, भगत सिंह एक ऐसे प्रतीक बनकर उभरे जिसने देश की युवा पीढ़ी को यह संदेश दिया कि आज़ादी सिर्फ़ नेताओं की रणनीति नहीं, बल्कि युवाओं की निडर कुर्बानी से भी लिखी गई थी।

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Anushka Pandey

Content Writer

Anushka Pandey as a Anchor and Content writer specializing in Entertainment, Histroical place, and Politics. They deliver clear, accurate, and engaging content through a blend of investigative and creative writing. Bagi brings complex subjects to life, making them accessible to a broad audience.

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