आज नवरात्रि का पाँचवाँ दिन है — जानिए माँ स्कंदमाता की पूजा विधि, शुभ रंग और वो रहस्य जो दिलाता है माँ और पुत्र दोनों का आशीर्वाद एक साथ
नवरात्रि का पाँचवाँ दिन 26 सितंबर को है जो माँ स्कंदमाता को समर्पित है वही देवी जिनकी गोद में हैं भगवान कार्तिकेय। मान्यता है कि इस दिन सही विधि से पूजा करने से न केवल माँ का स्नेह मिलता है, बल्कि साहस, बुद्धि और समृद्धि का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। आइए जानते हैं, क्यों इतना खास है माँ स्कंदमाता का दिन और कैसे उनके आशीर्वाद से जीवन हो सकता है सुख, शांति और विजय से भरपूर।
कौन है माँ स्कंदमाता?
पांचवें दिन की देवी हैं माँ स्कंदमाता यानी स्कंद की माता। उनका नाम “स्कंद” (कार्तिकेय) और “माता” से मिलकर बना है।
उनका स्वरूप ऐसा है:
वे कमल (lotus) पर विराजित होतीं हैं और उनके गालों पर सौम्य प्रकाश झलकता है। चार भुजाएँ हैं जिसमें दो हाथों में कमल धारण करती, एक हाथ अभय मुद्रा में, और एक हाथ में वे अपने पुत्र स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में लिए रहती हैं। वे सिंह (lion) पर सवार होती हैं, जो शक्ति, साहस और मातृत्व का मेल दर्शाता है। इस रूप में वे हमें यह संदेश देती हैं कि माँ शक्ति और कोमलता दोनों का संगम हो सकती है — वे केवल शक्ति नहीं, बल्कि देखभाल, सुरक्षा और मार्गदर्शन की देवी हैं।
तिथि, दिन और शुभ समय
नवरात्रि का पाँचवाँ दिन 26 सितंबर 2025 को होगा (ज्यादातर पंचांगों के अनुसार)। यह दिन पंचमी तिथि के अंतर्गत आता है, इस दिन की पूजा “पंचमी तिथि” में होती है। इस दिन पूजा-समय और मुहूर्त आपके स्थानीय पंचांग पर निर्भर करेगा सुबह के समय शुभ काल देखें। इस दिन का रंग अक्सर हरे रंग माना जाता है क्योंकि हरा जीवंतता, विकास और सृजन का प्रतीक है। द टाइम्स ऑफ इंडिया के एक ज्योतिषीय लेख में कहा गया है कि Day 5 (स्कंदमाता) के लिए बुध ग्रह (Mercury) से संबंध जोड़ते हुए, हरे रंग और तुलसी आदि उपायों की काफी महत्ता होती है।
पूजा विधि: चरणबद्ध विधि
नीचे चरणबद्ध रूप में बताया गया है कि कैसे आप श्रद्धा और भक्ति भाव से माँ स्कंदमाता की पूजा कर सकते हैं:
1. प्रभात स्नान और सफाई
सुबह जल्दी उठें, स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को साफ-सुथरा रखें।
2. घटस्थापना / कलश स्थापना
अगर आपने कलश नहीं रखा है, तो कलश स्थापना करें — उसमें जल, नौ प्रकार के अनाज (नवधान्य), सुपारी, अक्षत आदि रखें।
3. मूर्ति/प्रतिमा स्थापना और सजावट
माँ स्कंदमाता की मूर्ति या फोटो को चौकी, फूल, कमल आदि से सजाएँ।
4. मंत्र जाप व आह्वान
मंत्रों का जाप करें। एक प्रसिद्ध मन्त्र है:
“सिंघासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥”
5. अभिषेक एवं अर्पण
देवी को दूध, दही, घृत, शहद, गंगाजल — पंचामृत से अभिषेक करें। फिर कमल, पुष्प, फल, मिठाई आदि अर्पित करें।
6. आरती और भजन
पूजा के अंत में आरती करें और भजन-कीर्तन करें।
7. प्रसाद वितरण और दान
भोग अर्पण करें और उसे परिवार एवं रिश्तेदारों में बाँटें। जरूरतमंदों को दान करें — भोजन, अनाज, वस्त्र आदि।
8. ध्यान व मनन
पूजा के बाद कुछ समय ध्यान करें, माँ स्कंदमाता की छवि और गुणों का चिंतन करें — मातृत्व, सुरक्षा, प्रेम।

महत्व और संदेश
पांचवें दिन की पूजा का आध्यात्मिक महत्व गहरा है:
मातृत्व का स्वरूप: स्कंदमाता हमें यह समझाती हैं कि दिव्य माँ सिर्फ शक्ति की प्रतीक ही नहीं होती बल्कि वे स्नेह, सुरक्षा और करुणा का भी रूप होती हैं।
द्विस्तरीय आशीर्वाद: उनकी पूजा में माँ के साथ-साथ उनके पुत्र स्कंद / कार्तिकेय की पूजा भी शामिल होती है, इस तरह आप दोनों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
ज्ञान और शक्ति: कहा जाता है कि भक्तों को बुद्धि (ज्ञान) और साहस भी मिलता है खासकर उन लोगों को जो विषयों, निर्णय और नियंत्रण की चुनौतियों से जूझ रहे हों।
बुध ग्रह की ऊर्जा: इस दिन की पूजा Mercury (बुध ग्रह) की शुभता को बढ़ाती है — व्यापार, शिक्षा, संचार आदि क्षेत्रों में सुधार की संभावना बढ़ती है। Times of India के ज्योतिषीय लेख में ऐसा संकेत दिया गया है कि पाँचवाँ दिन बुध से जुड़ा है।
इस दिन को खास बनाने के उपाय
हरी चीजों का प्रयोग: पूजा में हरे फल, हरे पत्ते, तुलसी, हरे आसन आदि प्रयोग करें।
संयमित भोजन: यदि व्रत रखते हैं, तो फलाहार या हल्का भोजन करें अवश्य शरीर की शक्ति का ख्याल रखें।
दान-पुण्य करें: किताबें, स्टेशनरी, कपड़े, अनाज आदि जरूरतमंदों को दें क्योंकि इससे पुण्य की प्राप्ति होता है और मन प्रसन्न होता है।
भक्ति संगीत और कथा: शाम के समय भजन-कीर्तन या स्कंदमाता की कथा सुनें इससे श्रद्धा और भक्ति भावना गहरी होती है।
मन की शुद्धि पर ध्यान: दिन भर नकारात्मक विचारों से दूर रहें, दूसरों को क्षमा करें, प्रेम और सद्भाव बनाए रखें।

अनुभव और भावनाएँ
पांचवा दिन अक्सर नवरात्रि की मध्य गति को पार कर, भक्तों में एक ऐसा एहसास जगाता है जैसे “माँ अब सिर्फ शक्ति नहीं — उनका प्रेम, सुरक्षा, मार्गदर्शन” भी साथ है। जब आप उनकी पूजा करते हैं, तो वह माँ-पुत्र संबंध की गहराई का अनुभव दिलाती हैं यह एहसास ही हमारी रक्षा के लिए एक दिव्य शक्ति है जो सशक्त होने के साथ कोमल भी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन में शक्ति और प्रेम दोनों की आवश्यकता होती है। महानता सिर्फ कठोरता में नहीं होती, बल्कि वह कोमलता, देखभाल और सुरक्षा की मूरत में भी होती है।