सिवान विधानसभा चुनाव 2025
सिवान | बिहार की राजनीति में सिवान विधानसभा सीट (नंबर 105) हमेशा से एक चर्चित क्षेत्र रही है। यहाँ का चुनाव जातीय समीकरण, गठबंधन की मजबूती और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ पर टिका रहता है। पिछले तीन चुनावों (2010, 2015 और 2020) के नतीजों से यह साफ है कि सिवान में सत्ता का पलड़ा बार-बार बदलता रहा है।
2010: भाजपा की बड़ी जीत
2010 में भाजपा उम्मीदवार व्यासदेव प्रसाद ने राजद प्रत्याशी अवध बिहारी चौधरी को हराया। उस समय भाजपा को लगभग 44% वोट मिले जबकि राजद को करीब 33% वोट मिले। जीत का अंतर भी काफ़ी बड़ा—करीब 12,500 वोट का रहा। यह चुनाव भाजपा के उभार और एनडीए के मजबूत संगठन का संकेत था।
2015: कांटे की टक्कर, फिर भी भाजपा आगे
2015 में भी व्यासदेव प्रसाद ने जीत दोहराई, लेकिन इस बार अंतर बहुत कम रहा। भाजपा को करीब 35% वोट मिले और जीत का अंतर घटकर सिर्फ़ 3,500 वोट रह गया। यह साफ दिखा कि राजद-जदयू गठबंधन के चलते विपक्ष मजबूत हो रहा है।
2020: राजद की वापसी
2020 में अवध बिहारी चौधरी (राजद) ने कड़ी टक्कर में जीत हासिल की। भाजपा प्रत्याशी ओमप्रकाश यादव को हार का सामना करना पड़ा। वोट शेयर लगभग बराबर रहा—राजद को 45.3% और भाजपा को 44.1%। जीत का अंतर सिर्फ़ 1,973 वोट था। यह नतीजा दर्शाता है कि सिवान में अब हर वोट की अहमियत है।
जातीय समीकरण : किसका पलड़ा भारी?
- मुस्लिम मतदाता: सिवान विधानसभा में करीब 18% मुस्लिम मतदाता हैं, जिनकी संख्या 80,000 से अधिक बताई जाती है। यह वर्ग अक्सर राजद के पक्ष में मतदान करता है।
- यादव मतदाता: यादव लगभग 14% आबादी के साथ राजद का पारंपरिक आधार हैं।
- प्रसाद/अन्य पिछड़ी जातियाँ (OBC/EBC): इनकी संख्या लगभग 9-10% है और ये अक्सर भाजपा की ओर झुकते हैं।
- दलित और महादलित वोटर: निर्णायक स्थिति में रहते हैं।
- हिन्दू बहुल पृष्ठभूमि: जिले में कुल 81% हिंदू और 18% मुस्लिम आबादी है, जिससे सांप्रदायिक समीकरण भी कई बार अहम हो जाते हैं।
राजनीतिक रुझान
- राजद की चुनौती: मुस्लिम-यादव समीकरण को बनाए रखना और EBC/SC समुदायों को साधना।
- भाजपा का एजेंडा: विकास कार्यों, बुनियादी ढाँचे और स्थानीय प्रत्याशी की स्वीकार्यता के आधार पर गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटरों को जोड़ना।
- मतदाता की प्रवृत्ति: पिछले चुनावों में देखा गया है कि सिवान में छोटा-सा स्विंग भी नतीजों को बदल सकता है।
- जाति जनगणना का असर: बिहार की हालिया जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट से पार्टियाँ अब रणनीति और भी जाति आधारित तरीके से बनाएंगी।

सिवान विधानसभा सीट पर राजनीति पूरी तरह संतुलन साधने का खेल है। 2010 और 2015 में भाजपा की लगातार जीत रही, लेकिन 2020 में राजद ने वापसी कर दी। यहाँ की चुनावी कहानी बताती है कि केवल जाति समीकरण ही नहीं, बल्कि विकास और प्रत्याशी की छवि भी जीत-हार का आधार बन रही है।
आगामी 2025 चुनाव में यह सीट फिर से बेहद रोमांचक होने वाली है। राजद अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने की कोशिश करेगा, जबकि भाजपा पिछले दो बार के अनुभवों से सीख लेकर वापसी की रणनीति बनाएगी। छोटे-छोटे वोटों का झुकाव, गठबंधन की मजबूती और प्रत्याशी की स्वीकार्यता तय करेगी कि सिवान का अगला विधायक कौन होगा।