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मधुबनी विधानसभा 2025: आरजेडी बनाम एनडीए – किसके खाते जाएगी सीट?

मधुबनी विधानसभा सीट 2025 में आरजेडी और एनडीए के बीच कड़ा मुकाबला।

जातीय समीकरण, गठबंधन और स्थानीय मुद्दों के आधार पर इस चुनाव के नतीजे प्रभावित होंगे।

 

मधुबनी। मिथिलांचल की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली मधुबनी विधानसभा सीट (संख्या 36) बिहार की राजनीति में हमेशा अहम रही है। यहाँ का चुनाव जातीय समीकरण, गठबंधन की मजबूती और स्थानीय मुद्दों पर तय होता है। पिछले तीन चुनावों पर नज़र डालें तो मतदाता हर बार नया समीकरण बनाते दिखे हैं। यही वजह है कि 2025 का मुकाबला बेहद दिलचस्प माना जा रहा है।

पिछले चुनावों का रिकॉर्ड

2010: बीजेपी के रामदेव महतो ने जीत दर्ज की। उस वक्त जेडीयू और बीजेपी एक साथ थे, जिससे एनडीए का समीकरण मजबूत रहा और विपक्ष बिखर गया।

2015: महागठबंधन (आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस) के समीर कुमार महासेठ ने बीजेपी के रामदेव महतो को हराया। यादव–मुस्लिम–दलित समीकरण ने आरजेडी को बढ़त दिलाई।

2020: सीट एनडीए की सहयोगी वीआईपी के खाते में थी। वीआईपी के सुमन कुमार महासेठ और आरजेडी के समीर महासेठ आमने-सामने थे। वोट बंटवारे का फायदा आरजेडी को मिला और समीर महासेठ करीब 6,800 वोटों से जीते।

तीन चुनावों में बीजेपी एक बार और आरजेडी दो बार विजयी रही। साफ है कि यह सीट किसी दल की “सेफ सीट” नहीं है।

जातीय गणित

  • मधुबनी विधानसभा सीट सामान्य (गैर-आरक्षित) है। यहाँ का सामाजिक ढाँचा हर चुनाव में बड़ा असर डालता है।
  • यादव और मुस्लिम वोटर आरजेडी का पारंपरिक आधार माने जाते हैं।
  • ब्राह्मण और भूमिहार समुदाय एनडीए के मजबूत समर्थक हैं।
  • कुशवाहा और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) बड़ी संख्या में हैं और अक्सर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
  • अनुसूचित जाति (13–14%) के वोटर भी नतीजे बदल सकते हैं।

यहाँ कोई भी दल सिर्फ एक जाति पर भरोसा नहीं कर सकता। सभी को संतुलन साधना पड़ता है।

लोकसभा बनाम विधानसभा

दिलचस्प है कि विधानसभा में लगातार दो बार आरजेडी जीती है, जबकि लोकसभा सीट पर बीजेपी का दबदबा है। 2009, 2014, 2019 और 2024—लगातार चार बार मधुबनी लोकसभा बीजेपी ने जीती। विधानसभा में स्थानीय चेहरों का असर दिखता है, जबकि लोकसभा में राष्ट्रीय लहर काम करती है।

मुख्य मुद्दे

1. विकास और आधारभूत संरचना – सड़क, बिजली और जल-निकासी की खराब स्थिति बड़ा सवाल है।

2. रोज़गार और पलायन – मिथिलांचल से युवाओं का पलायन गंभीर समस्या बनी हुई है।

3. शिक्षा और स्वास्थ्य – मेडिकल और उच्च शिक्षा संस्थानों की कमी पर नाराजगी है।

4. महिला सशक्तिकरण – महिला साक्षरता दर कम है, महिला वोटरों का रुख नतीजे बदल सकता है।

5. गठबंधन की एकजुटता – एनडीए की सीट बंटवारा नीति और महागठबंधन की मजबूती दोनों अहम होंगी।

2025 की तैयारी

आरजेडी: मौजूदा विधायक समीर महासेठ लगातार दो बार जीत चुके हैं। यादव–मुस्लिम समीकरण मजबूत है, लेकिन विकास के मुद्दों पर जनता सवाल उठा रही है।

बीजेपी/एनडीए: लोकसभा में मजबूत पकड़ है। अगर सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन में एकजुटता बनी, तो वापसी की संभावना है।

छोटी पार्टियाँ (VIP, LJP आदि): अगर ये अलग लड़ीं तो वोट बंट सकते हैं, जिसका फायदा आरजेडी को मिल सकता है।

 

नतीजे का असर

मधुबनी की लड़ाई आसान नहीं होगी। 2010 में बीजेपी और 2015 व 2020 में आरजेडी की जीत दिखाती है कि यहाँ नतीजे जातीय संतुलन, गठबंधन की स्थिति और स्थानीय मुद्दों पर तय होते हैं।

2025 का बड़ा सवाल है—

क्या समीर महासेठ हैट्रिक बनाएंगे या बीजेपी/एनडीए फिर से कब्जा जमाएगा?

जो भी जीते, उसका असर न सिर्फ़ मिथिलांचल बल्कि पूरे बिहार की राजनीति पर पड़ेगा।

Shashwat Srijan

Content Writer

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