मुज़फ़्फ़रपुर विधानसभा चुनाव 2025: भाजपा या कांग्रेस, किसकी बनेगी सरकार?
मुज़फ़्फ़रपुर। उत्तर बिहार की राजनीति में मुज़फ़्फ़रपुर विधानसभा सीट हमेशा से अहम रही है। यह शहरी सीट है और यहाँ के मतदाता सिर्फ जातीय समीकरण पर ही नहीं, बल्कि विकास, रोज़गार, पानी-बिजली, ट्रैफिक और सफाई जैसी रोजमर्रा की समस्याओं को देख कर वोट देते हैं।
कई दशकों तक भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली यह सीट 2020 में कांग्रेस के हाथ चली गई। यही वजह है कि 2025 का चुनाव यहाँ बेहद दिलचस्प माना जा रहा है।
पिछले तीन चुनावों का हाल
2010 का चुनाव – भाजपा की बड़ी जीत
2010 में भाजपा के सुरेश कुमार शर्मा ने जबरदस्त जीत दर्ज की। उन्हें लगभग 59% वोट मिले और प्रतिद्वंद्वियों को बड़े अंतर से हराया। इस जीत ने भाजपा की पकड़ मजबूत कर दी और माना जाने लगा कि मुज़फ़्फ़रपुर अब उनका किला बन चुका है।
2015 का चुनाव – भाजपा की पकड़ बनी रही
2015 में पूरे बिहार में महागठबंधन की लहर थी। इसके बावजूद सुरेश कुमार शर्मा ने कांग्रेस के प्रिय रंजन को हराकर सीट बचाई। इस बार उनका वोट शेयर करीब 55% रहा। जीत का अंतर थोड़ा घट गया, लेकिन भाजपा की पकड़ बरकरार रही।
2020 का चुनाव – कांग्रेस की वापसी
2020 में माहौल बदल गया। कांग्रेस के विजयेंद्र चौधरी ने भाजपा के सुरेश शर्मा को कड़ी टक्कर दी और जीत हासिल की। उन्हें 48.16% वोट मिले, जबकि भाजपा को 44.44% वोट ही मिले। जीत का अंतर केवल 6,326 वोट का था। यह साबित करता है कि मुज़फ़्फ़रपुर सीट अब किसी भी पार्टी की “सेफ सीट” नहीं रही।
जातीय समीकरण
मुज़फ़्फ़रपुर की राजनीति में जातीय संतुलन बड़ी भूमिका निभाता है।
सवर्ण और ओबीसी समुदाय – भाजपा का परंपरागत आधार।
मुस्लिम मतदाता (करीब 18–19%) – निर्णायक भूमिका निभाते हैं और अक्सर भाजपा विरोधी खेमे में एकजुट होते हैं।
अनुसूचित जाति (SC – 9–10%) – इनकी दिशा चुनाव परिणाम तय कर सकती है।
ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) – बड़ी संख्या में हैं और कई बार ‘किंगमेकर’ साबित होते हैं।
मतलब, किसी भी पार्टी को केवल एक जाति के भरोसे नहीं रहना चाहिए। यहाँ व्यापक सामाजिक समीकरण साधना बेहद जरूरी है।
वोटिंग पैटर्न
मुज़फ़्फ़रपुर विधानसभा में पिछले चुनावों को देखें तो एक साफ पैटर्न दिखाई देता है।
2010 और 2015 में भाजपा लगातार जीतती रही।
2020 में कांग्रेस ने वापसी की और भाजपा को करारी शिकस्त दी।
मतदाता हर चुनाव में अलग संदेश देते हैं। छोटे दल और निर्दलीय उम्मीदवार भी वोट बंटवारे के कारण बड़े दलों की रणनीति पर असर डाल सकते हैं।
2025 का चुनाव : चुनौती और मौका
भाजपा – 2020 में हार के बाद भाजपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल है। पार्टी को सवर्ण और शहरी मतदाताओं का समर्थन बनाए रखना होगा, साथ ही ओबीसी और ईबीसी समुदाय में भी पकड़ मजबूत करनी होगी।
कांग्रेस/महागठबंधन – 2020 में विजयेंद्र चौधरी की जीत ने साबित किया कि कांग्रेस के पास मुस्लिम और दलित वोटों का ध्रुवीकरण है। उन्हें शहरी और मध्यम वर्ग के मतदाताओं का भरोसा भी बनाए रखना होगा।
अन्य दल – राजद, LJP या अन्य छोटे दल अगर सक्रिय हुए तो वोट बंट सकते हैं और मुख्य दलों के लिए मुकाबला और कठिन हो सकता है।
प्रमुख मुद्दे और मतदाता
मुज़फ़्फ़रपुर के मतदाता शहरी हैं, इसलिए उनकी समस्याएँ भी शहरी हैं।
गंदगी और कचरा प्रबंधन – शहर में साफ-सफाई बड़ी चुनौती है।
ट्रैफिक और सड़कें – जाम और सड़कें खराब होने से मतदाता परेशान हैं।
बाढ़ और जलजमाव – बारिश के मौसम में ये समस्या खासतौर पर गंभीर होती है।
रोजगार और उद्योगों की कमी – युवा और पहली बार वोट डालने वाले मतदाता इस मुद्दे को अहम मानते हैं।
युवा और महिला मतदाता इस बार निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

मुज़फ़्फ़रपुर विधानसभा सीट अब किसी पार्टी की “सेफ सीट” नहीं रही। 2010 और 2015 में भाजपा ने लगातार जीत दर्ज की, लेकिन 2020 में कांग्रेस ने बाज़ी मारी।
2025 का चुनाव फिर कांटे की टक्कर वाला होगा। देखना यह है कि क्या भाजपा अपनी खोई सीट वापस ले पाएगी या कांग्रेस अपना किला बचा पाएगी। इतना तय है कि मुज़फ़्फ़रपुर का नतीजा पूरे उत्तर बिहार की राजनीति पर गहरा असर डालेगा।
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