Fact Check
Search

किशनगंज विधानसभा : कांग्रेस का गढ़, लेकिन वोट बंटवारे से बढ़ी अनिश्चितता

किशनगंज विधानसभा : कांग्रेस का गढ़, लेकिन वोट बंटवारे से बढ़ी अनिश्चितता

 

किशनगंज। बिहार की सीमांचल राजनीति में किशनगंज विधानसभा सीट (संख्या 54) हमेशा सुर्खियों में रही है। यह सीट मुस्लिम बहुल इलाका होने के कारण खास पहचान रखती है। यहाँ के मतदाता जातीय और धार्मिक समीकरणों के साथ-साथ शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विकास के मुद्दों को ध्यान में रखकर भी वोट करते हैं। लंबे समय से कांग्रेस का दबदबा यहाँ कायम रहा है। लेकिन बीजेपी की लगातार कड़ी चुनौती और एआईएमआईएम जैसे दलों की एंट्री से समीकरण जटिल होते जा रहे हैं।

 

 

पिछले तीन चुनावों का हाल

किशनगंज विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने लगातार पकड़ बनाए रखी है, हालांकि जीत का अंतर हमेशा उतार-चढ़ाव भरा रहा है।

2010 का चुनाव – कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. मोहम्मद जावेद ने बीजेपी की स्वीटी सिंह को बेहद कांटे की टक्कर में हराया। उन्हें लगभग 31.3% वोट मिले, जबकि बीजेपी को 31.1% वोट हासिल हुए। जीत का अंतर सिर्फ 264 वोट का था। यह नतीजा बताता है कि मुकाबला कितना करीबी रहा।

2015 का चुनाव – इस बार कांग्रेस को थोड़ी राहत मिली। डॉ. जावेद ने एक बार फिर स्वीटी सिंह को हराया। इस बार जीत का अंतर बढ़कर 8,609 वोट तक पहुँच गया। कांग्रेस को 38.8% और बीजेपी को 33.8% वोट मिले। यह कांग्रेस की लगातार तीसरी जीत थी।

2020 का चुनाव – इस चुनाव में कांग्रेस ने इजहारुल हुसैन को मैदान में उतारा। उन्होंने स्वीटी सिंह को 1,381 वोटों से हराया। कांग्रेस को 34.2% और बीजेपी को 33.4% वोट मिले। यानी कांग्रेस जीती जरूर, लेकिन जीत का अंतर फिर बहुत कम हो गया।

इन नतीजों से साफ है कि कांग्रेस इस सीट पर हावी है, मगर बीजेपी हर बार उसे कड़ी चुनौती देती रही है।

 

 

 

जातीय और सामाजिक समीकरण

किशनगंज का चुनावी गणित पूरी तरह जनसांख्यिकीय और जातीय समीकरणों पर टिका है।

मुस्लिम मतदाता (68–70%) – यह यहाँ की सबसे बड़ी आबादी है। आमतौर पर ये वोट कांग्रेस या क्षेत्रीय दलों (आरजेडी, एआईएमआईएम) की ओर जाता है। वोटों का एकजुट रहना कांग्रेस की जीत की कुंजी है, लेकिन बंटवारा होते ही बीजेपी को बड़ा फायदा मिल जाता है।

हिन्दू मतदाता (30–32%) – इसमें ब्राह्मण, राजपूत, ओबीसी और ईबीसी समुदाय शामिल हैं। इनका बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ रहता है।

अनुसूचित जाति और जनजाति (SC 6%, ST 3–4%) – इनका वोट किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़ा। हालात और उम्मीदवार पर निर्भर करता है कि ये किसे समर्थन देंगे।

यानी, मुस्लिम वोट कांग्रेस की ताकत हैं, जबकि हिन्दू वोट बीजेपी की मजबूती का आधार।

वोटिंग पैटर्न

पिछले तीन चुनावों में किशनगंज की राजनीति ने एक खास पैटर्न दिखाया है –

  • 2010 में बेहद मामूली अंतर से कांग्रेस जीती।
  • 2015 में जीत का अंतर बढ़ा।
  • 2020 में फिर से कांग्रेस की जीत का अंतर घट गया।

 

इससे साफ झलकता है कि मतदाता कांग्रेस को लगातार मौका दे रहे हैं, लेकिन हर बार कम अंतर से। यानी, मतदाताओं में बदलाव की चाह धीरे-धीरे उभर रही है।

2025 का चुनाव : किसके लिए चुनौती, किसके लिए उम्मीद?

कांग्रेस – मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा बनाए रखना उसकी सबसे बड़ी चुनौती है। अगर वोटों का बिखराव नहीं हुआ तो जीत की संभावना मजबूत होगी। लेकिन युवाओं और विकास के मुद्दों को साधे बिना उसकी राह कठिन हो सकती है।

बीजेपी – हिन्दू वोटरों का ठोस समर्थन पहले से है। अगर मुस्लिम वोटों में बंटवारा हुआ तो बीजेपी बढ़त बना सकती है। लगातार तीन बार हारने के बावजूद उसका वोट शेयर हर चुनाव में 30% से ऊपर रहा है, जो उसकी ताकत दिखाता है।

एआईएमआईएम और आरजेडी – ये दल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। अगर मुस्लिम वोटों को बांट दिया तो कांग्रेस की जीत का रास्ता मुश्किल हो जाएगा।

अन्य दल – छोटे दल अब तक ज्यादा असरदार नहीं रहे, लेकिन त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले में वे भी गेम चेंजर साबित हो सकते हैं।

 

 

मुद्दे और मतदाता

किशनगंज जिला अब भी विकास की दृष्टि से पिछड़ा हुआ माना जाता है। मतदाता हर चुनाव में निम्न मुद्दों पर ध्यान देते हैं –

  • सड़क और कनेक्टिविटी की समस्या
  • शिक्षा संस्थानों की कमी
  • स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
  • बेरोजगारी और पलायन
  • बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा
  • युवा और महिला मतदाता यहाँ निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

 

 

किशनगंज विधानसभा पिछले तीन चुनावों से कांग्रेस का गढ़ बनी हुई है। लेकिन जीत का घटता अंतर यह संकेत देता है कि मतदाता विकल्पों की तलाश में हैं। मुस्लिम वोटों का बंटवारा और हिन्दू मतदाताओं की एकजुटता 2025 का सबसे बड़ा फैक्टर होगा। अब देखना यह है कि कांग्रेस अपना गढ़ बचा पाती है या बीजेपी और क्षेत्रीय दल यहाँ नई कहानी लिखते हैं। इतना तय है कि किशनगंज का चुनाव इस बार पूरे सीमांचल और बिहार की राजनीति में अहम असर डालेगा।

Shashwat Srijan

Content Writer

Leave a Comment

Your email address will not be published.