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अररिया विधानसभा चुनाव 2025

अररिया विधानसभा चुनाव 2025: कांग्रेस की पकड़ या NDA की चुनौती?

 

अररिया। बिहार के सीमांचल क्षेत्र की यह विधानसभा सीट हमेशा राजनीतिक ध्यान का केंद्र रही है। अररिया मुस्लिम बहुल इलाका है और यहां हर चुनाव में जातीय समीकरण, विकास के मुद्दे और दलों की रणनीतियां नतीजे बदल देती हैं।

 

यह सीट सामान्य श्रेणी की है, यानी किसी भी जाति या समुदाय का उम्मीदवार चुनाव लड़ सकता है। 2020 में कांग्रेस की जीत ने समीकरण बदल दिए हैं, लेकिन 2025 का चुनाव फिर से रोमांचक होने वाला है।

 

पिछले तीन चुनावों का हाल

2010 – LJP की जीत

साल 2010 में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के ज़ाकिर हुसैन खान ने जीत हासिल की। उन्होंने करीब 18 हज़ार वोटों के अंतर से भाजपा और कांग्रेस को पीछे छोड़ा। उस समय मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ था, जिससे NDA और LJP को फायदा मिला।

 

2015 – कांग्रेस की वापसी

2015 में कांग्रेस उम्मीदवार अबिदुर रहमान ने जोरदार जीत हासिल की। मुस्लिम–यादव गठजोड़ ने कांग्रेस को मजबूती दी और उन्होंने लगभग 40 हज़ार वोटों के अंतर से LJP और NDA को हराया।

 

2020 – कांग्रेस की बड़ी जीत

2020 में अबिदुर रहमान ने फिर चुनाव लड़ा और जीत का अंतर और बढ़ गया। उन्हें 1,03,000 से ज्यादा वोट मिले, जबकि भाजपा और JDU का विरोध करने वाले उम्मीदवार पीछे रह गए। JDU की शगुफ्ता अज़ीम दूसरे स्थान पर रहीं।

 

इन तीनों चुनावों से साफ है कि 2010 के बाद से कांग्रेस ने अररिया में लगातार पकड़ बनाई है।

 

जातीय समीकरण

  • अररिया विधानसभा की राजनीति पूरी तरह जातीय और धार्मिक संतुलन पर आधारित है।
  • मुस्लिम मतदाता (55–56%) – सबसे बड़ा वोट बैंक, चुनाव के रुख को तय करता है।
  • यादव (OBC) – मुस्लिम–यादव गठजोड़ महागठबंधन की जीत का मुख्य आधार।
  • अन्य OBC और सवर्ण मतदाता – भाजपा और JDU के समर्थन में।
  • SC और EBC – अक्सर चुनाव का समीकरण पलट सकते हैं।

 

मतलब यह है कि यहां कोई भी पार्टी सिर्फ एक वर्ग पर भरोसा नहीं कर सकती। सभी जातियों और समुदायों को साथ लेकर चलना जरूरी है।

 

वोटिंग पैटर्न

  • 2010 में LJP ने जीत दर्ज की।
  • 2015 में कांग्रेस ने जोरदार वापसी की।
  • 2020 में कांग्रेस ने और भी बड़े अंतर से जीत हासिल की।

 

इस पैटर्न से पता चलता है कि मुस्लिम–यादव वोटों का एकजुट होना कांग्रेस के लिए फायदेमंद है, लेकिन वोट बंटवारे से अन्य दलों को मौके मिल सकते हैं। छोटे दल जैसे AIMIM भी कभी-कभी वोट काटते हैं।

 

2025 का चुनाव: चुनौती और उम्मीद

कांग्रेस/महागठबंधन – लगातार दो बार जीत के बाद कांग्रेस के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल है। अबिदुर रहमान का अनुभव और मुस्लिम–यादव गठजोड़ उनकी ताकत है। चुनौती यह है कि AIMIM जैसे दल मुस्लिम वोटों में सेंध न लगा पाएं।

 

भाजपा/जेडीयू (NDA) – NDA के लिए चुनौती बड़ी है। उन्हें गैर–यादव OBC, सवर्ण और SC वोटों को जोड़ना होगा। मुस्लिम वोटों में बंटवारा होने पर ही उन्हें मौका मिल सकता है।

 

अन्य दल – AIMIM और छोटे दल अगर मजबूत उम्मीदवार उतारते हैं तो मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। वोट बंटवारे से मुख्य दलों का गणित बिगड़ सकता है।

 

प्रमुख मुद्दे और मतदाता

अररिया सीमांचल का पिछड़ा इलाका है, इसलिए गरीबी, बेरोज़गारी और बाढ़ लंबे समय से बड़ी समस्याएं हैं।

 

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर मतदाताओं के लिए सबसे अहम हैं।

 

नई पीढ़ी, खासकर युवा और महिलाएं, 2025 के चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगी।

 

मतदाता अब केवल जाति नहीं बल्कि उम्मीदवार की छवि और विकास के मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं।

 

अररिया विधानसभा चुनाव 2025

अररिया विधानसभा सीट अब किसी पार्टी की “सेफ सीट” नहीं रही। 2010 में LJP, 2015 और 2020 में कांग्रेस ने अपनी ताकत दिखाई।

 

2025 का मुकाबला फिर कांटे की टक्कर वाला होगा। क्या कांग्रेस अपनी बढ़त बनाए रखेगी या NDA किसी चमत्कार की तरह जीत दर्ज करेगी? इतना तय है कि अररिया का नतीजा सीमांचल और पूरे उत्तर बिहार की राजनीति पर असर डालेगा।

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Shashwat Srijan

Content Writer

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