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बिहार का चुनावी रण : पुर्णिया विधानसभा में किसकी बनेगी सरकार?

बिहार चुनाव 2025 में पुर्णिया विधानसभा सीट पर सबकी नज़रें। पिछले तीन चुनावों में भाजपा ने लगातार जीत दर्ज की है। क्या इस बार कांग्रेस और महागठबंधन चुनौती दे पाएंगे? पढ़ें पूरा विश्लेषण।

पुर्णिया। बिहार चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं और सीमांचल की पुर्णिया सीट पर सबकी नज़रें टिकी हैं। यह विधानसभा सीट हमेशा से राजनीति में खास मानी जाती है। यहां का जातीय और सामाजिक समीकरण थोड़ा पेचीदा है। यही वजह है कि हर पार्टी यहां पूरी ताकत झोंकती है। पिछले तीन चुनावों में भाजपा ने लगातार जीत दर्ज की है और फिलहाल उसका पलड़ा भारी माना जा रहा है।

 

पिछले तीन चुनावों का हाल

  • 2010 चुनाव: भाजपा के राज किशोर केशरी ने कांग्रेस के राम चरित्र यादव को हराया। भाजपा को लगभग 41% वोट मिले।
  • 2015 चुनाव: भाजपा के विजय कुमार खेमा ने कांग्रेस की इंदु सिन्हा को मात दी। इस बार भाजपा का वोट शेयर करीब 49% रहा।
  • 2020 चुनाव: फिर वही मुकाबला हुआ। भाजपा के विजय कुमार खेमा ने इंदु सिन्हा को हराते हुए 52% से ज्यादा वोट हासिल किए।

तीनों चुनावों के नतीजों से साफ है कि भाजपा की पकड़ लगातार मजबूत होती गई और कांग्रेस कमजोर होती चली गई। ऐसे में यह चुनाव काँग्रेस के लिए बहुत महत्वपूर्ण है

जातीय समीकरण

  • यहां मुस्लिम और यादव वोटर बड़ी संख्या में हैं। यही समीकरण महागठबंधन के लिए ताकत माना जाता है।
  • सवर्ण जातियां और शहरी मध्यम वर्ग भाजपा का मुख्य आधार रहे हैं।
  • कुछ पिछड़ी जातियां भी भाजपा के साथ जाती रही हैं।
  • विपक्षी दलों में एकजुटता की कमी भी भाजपा की लगातार जीत का कारण बनी।

 

वोटिंग पैटर्न

  • पुर्णिया के वोटरों ने पिछले तीन चुनावों में भाजपा को चुना है।
  • 2010 में कांग्रेस हारी।
  • 2015 और 2020 में भाजपा के विजय कुमार खेमा ने कांग्रेस की इंदु सिन्हा को लगातार हराया।
  • हर चुनाव में भाजपा का वोट शेयर बढ़ा, जबकि कांग्रेस पीछे हटती गई।

यह पैटर्न दिखाता है कि जनता विपक्ष की रणनीति और उम्मीदवारों से संतुष्ट नहीं रही।

 

2025 का चुनाव – किसके लिए आसान, किसके लिए मुश्किल?

भाजपा: लगातार तीन बार जीतने के बाद भाजपा मजबूत स्थिति में है। विजय कुमार खेमा का अनुभव और पार्टी का संगठन उसकी सबसे बड़ी ताकत है। चुनौती यह होगी कि क्या वह जनता की नाराज़गी से बच पाएगी या नहीं।

कांग्रेस/महागठबंधन: कांग्रेस बार-बार इंदु सिन्हा पर निर्भर रही, लेकिन नतीजा हर बार हार रहा। महागठबंधन के लिए जरूरी होगा कि मुस्लिम और यादव वोटरों को एकजुट करें और नए चेहरों या मुद्दों को आगे लाएँ।

अन्य दल: छोटे दलों का असर सीमित रहा है। अगर वे चुनाव लड़ेंगे तो वोटों का बंटवारा हो सकता है और मुकाबले का असर बदल सकता है।

मुद्दे और मतदाता

  • पुर्णिया में लोग विकास से जुड़े मुद्दों पर बात कर रहे हैं।
  • अच्छी सड़कें
  • शिक्षा और अस्पताल
  • रोजगार के मौके

युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों के लिए यही मुद्दे सबसे अहम हैं। अगर विपक्ष इन्हें जोर से उठाता है तो भाजपा को चुनौती मिल सकती है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

चुनावी विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार खालिद अहमद कहते हैं की “अभी की स्थिति में भाजपा इस सीट पर आगे दिख रही है। 2010, 2015 और 2020 में उसकी लगातार जीत ने इसे साबित कर दिया है। हालांकि, बिहार की राजनीति में हालात जल्दी बदलते हैं। अगर महागठबंधन मुस्लिम-यादव वोटों को पूरी तरह साध ले और विकास के मुद्दों को जोर से उठाए, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है।”

लेकिन फिलहाल पुर्णिया सीट पर भाजपा बढ़त में दिखाई दे रही है और विपक्ष को कड़ी मेहनत करनी होगी।

Shashwat Srijan

Content Writer

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