बदलते दौर की बदलती परिभाषा
क्या कभी आपके दिमाग में ये सवाल आया है—आज के युवा शादी से पहले live-in में रहना क्यों पसंद कर रहे हैं? पहले के जमाने में शादी ही रिश्तों की “अंतिम मंज़िल” होती थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। युवा खुलकर जीना चाहते हैं, बिना बंधन और सामाजिक दबाव के। यही वजह है कि live-in रिलेशनशिप अब एक “टैबू” नहीं आम जीवनशैली का हिस्सा बन गई है।
युवाओं की सोच: “पहले समझें, फिर बंधें
आज की पीढ़ी रिश्तों को आज़ादी और बराबरी के नज़रिए से देखती है। नौकरी, शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता ने उन्हें ये ताकत दी है कि वे अपने फैसले खुद लें। शादी से पहले पार्टनर को समझना ,रिश्ते की मजबूती को परखना। सामाजिक और पारिवारिक दबाव से बचना। इन वजहों से live-in युवाओं की पसंद बन रहा है। कई युवा कहते हैं—“शादी से पहले क्यों न ये देख लिया जाए कि हम सच में एक-दूसरे के साथ रह सकते हैं या नहीं?”
सुप्रीम कोर्ट की मुहर
कानून भी इस सोच को पूरी तरह नकारता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि अगर दो वयस्क अपनी मर्जी से साथ रहते हैं, तो यह उनका मौलिक अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद 21, यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, उन्हें इसकी अनुमति देता है। हाल ही में कोर्ट ने यह भी माना कि अगर कोई जोड़ा लंबे समय तक साथ रहा है, तो यह माना जाएगा कि उनका रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित है। ऐसे में झूठे वादों या बलात्कार के आरोप को केवल live-in के आधार पर साबित नहीं किया जा सकता।

कानून की सुरक्षा: महिलाओं और बच्चों के लिए
भारत में live-in पर अलग से कोई कानून नहीं है, लेकिन अदालतों और मौजूदा अधिनियमों ने इसे कुछ हद तक मान्यता दी है।
1. घरेलू हिंसा से सुरक्षा
2005 का प्रोटेक्शन ऑफ विमेन फॉर्म डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट live-in को “शादी जैसे रिश्ते” की श्रेणी में रखता है। यानी महिला साथी घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना या आर्थिक शोषण के खिलाफ कानूनी सुरक्षा पा सकती है।
2. रख-रखाव का अधिकार
अगर महिला लंबे समय तक live-in में रही है और आर्थिक रूप से निर्भर है, तो वह धारा 125 CrPC के तहत रख-रखाव की मांग कर सकती है।
3. बच्चों का भविष्य
सुप्रीम कोर्ट ने तुलसा वर्सेज दुर्घटिया (2008) में कहा कि live-in से जन्मे बच्चों को “अवैध” नहीं माना जाएगा। उन्हें विरासत का पूरा अधिकार मिलेगा।
समाज की दुविधा
कानून चाहे जितनी भी सुरक्षा दे दे, लेकिन सच्चाई ये है कि समाज अभी भी Live-in रिलेशनशिप को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया है। कई लोग इसे अब भी “पश्चिमी संस्कृति की देन” कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कुछ का मानना है कि यह रिश्तों की ज़िम्मेदारी और कमिटमेंट से बचने का आसान तरीका है। वहीं परिवार और रिश्तेदारों का दबाव अलग स्तर पर होता है युवाओं को अक्सर पड़ोसियों की टेढ़ी नज़रों, तानों और सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।यानी, प्यार और समझदारी से चुना गया रिश्ता भी समाज की जाँच-परख की कसौटी पर खड़ा नहीं उतरता।

उत्तराखंड का प्रयोग: पंजीकरण अनिवार्य
फरवरी 2024 में उत्तराखंड सरकार ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू किया। इसके तहत live-in रिलेशनशिप का पंजीकरण ज़रूरी कर दिया गया है। नियम तोड़ने पर तीन महीने जेल या 25,000 रुपये जुर्माने का प्रावधान है।लेकिन जनवरी 2025 तक केवल 28 जोड़ों ने पंजीकरण कराया जबकि हजारों लोग live-in में रहते हैं।
अब तक किसी पर दंड नहीं लगा है। बहस छिड़ी है—क्या यह महिलाओं की सुरक्षा के लिए है या राज्य का निजी जीवन में अनचाहा हस्तक्षेप? रिश्तों की दुनिया तेजी से बदल रही है। live-in अब केवल “फैशन” नहीं बल्कि एक सोच का हिस्सा है। कानून ने महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा देकर एक संतुलन बनाने की कोशिश की है। लेकिन सामाजिक स्वीकार्यता अभी भी बड़ी चुनौती है। Live-in रिलेशनशिप न तो पूरी तरह गलत है और न ही समाज-विरोधी।
यह युवाओं की आज़ादी, आत्मनिर्भरता और रिश्तों की पारदर्शिता का प्रतीक है। आने वाले समय में जरूरी है कि कानून और समाज दोनों इस बदलाव को खुले मन से स्वीकारें। तभी यह रिश्ता वाकई सुरक्षित और स्थायी विकल्प बन पाएगा।
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